Rinpas Kanke Ranchi News : रिनपास पर मेहरबान स्वास्थ्य महकमा! शपथ पत्रों के बाद भी कार्रवाई से पीछे क्यों हट रहा तंत्र?

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निरंजन भारती | द जन सभा

सरकारी तंत्र में जब किसी फाइल पर धूल जमने लगे और उठते सवालों के बीच विभाग मौन व्रत धारण कर ले, तो समझ जाइए कि मामला आम नहीं है। झारखंड का एकमात्र प्रतिष्ठित मानसिक रोगियों का अस्पताल रिनपास इन दिनों किसी इलाज या सुधार के कारण नहीं, बल्कि अपनी अनोखी प्रशासनिक खामोशी को लेकर चर्चा में है। टेंडर प्रक्रिया से लेकर करोड़ों की दवा खरीद में कथित तौर पर अपनी मर्जी चलाने का खेल चल रहा है। ताज्जुब की बात यह है कि तीन-तीन शिकायतकर्ताओं ने साक्ष्यों के साथ बाकायदा शपथ पत्र तक सौंप दिए, स्वास्थ्य विभाग ने जवाब तलब भी किया, लेकिन समय का पहिया घूमता रहा और जवाब का इंतजार अब एक लंबे सन्नाटे में तब्दील हो चुका है।

रिनपास में किसकी छत्रछाया में चल रही मनमानी?

इस पूरे घटनाक्रम में सबसे दिलचस्प बात यह है कि नियम-कायदों की दुहाई देने वाला तंत्र यहाँ एकदम शांत नज़र आ रहा है। कथित तौर पर कुछ रसूखदार चेहरों के ऐसे अनोखे तालमेल की चर्चा है, जहाँ हर नियम को किनारे रखकर फैसले लिए जा रहे हैं। जब विभागीय स्तर पर महज 15 दिनों में स्पष्टीकरण मांगा गया था, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि तीन महीने बीत जाने के बाद भी फाइलें आगे क्यों नहीं बढ़ीं। क्या यह सिर्फ प्रशासनिक ढिलाई है या फिर किसी अदृश्य चादर से पूरे मामले को ढकने की सुनियोजित कोशिश हो रही है।

शिकायतकर्ताओं सूरज प्रकाश गुप्ता, उत्तम कुमार और सोनू तिर्की का रुख इस मामले में बेहद सख्त नज़र आता है। उनका स्पष्ट आरोप है कि जेम पोर्टल और टेंडर प्रक्रियाओं में भारी अनियमितताएं बरती गई हैं बिना वित्तीय बोलियां खोले महीनों तक मामलों को लटकाया गया और फिर मनमाने तरीके से रद्द कर नए टेंडर जारी किए गए। जब विभाग ने साक्ष्य मांगे, तो शिकायतकर्ताओं ने बिना किसी हिचकिचाहट के शपथ पत्र के साथ ठोस दस्तावेज सौंप दिए। अब उनका सीधा तर्क है कि जब निगरानी अदालत और एसीबी तक मामलों का हवाला दिया जा चुका है, तो फिर प्रशासनिक कार्रवाई करने में यह हिचकिचाहट क्यों दिखाई जा रही है?

झामुमो नेता की शिकायत और स्वास्थ्य विभाग की खामोशी! रिनपास के बहाने गठबंधन में छिड़ी अंदरूनी जंग?

झारखंड का इकलौता मानसिक स्वास्थ्य संस्थान रिनपास में हो रहे भ्रष्टाचार और कुछ खास लोगों द्वारा संस्थान के दोहन के खिलाफ सत्ताधारी दल के प्रमुख घटक दल के जमीन से जुड़े वरीय नेता सोनू मुंडा, समनूर मंसूरी और कांके प्रखंड अध्यक्ष नवीन तिर्की जैसे लोग काफी मुखर हैं। मामला तब और दिलचस्प हो जाता है जब यह बात सामने आती है कि शिकायतकर्ताओं में से एक, सोनू तिर्की उर्फ सोनू मुंडा, खुद सत्ताधारी दल झारखंड मुक्ति मोर्चा के संयोजक सदस्य हैं; अपनी ही सरकार के कार्यकाल में एक प्रमुख नेता का यूँ शपथ पत्र देकर विभाग की व्यवस्था पर सवाल खड़ा करना सामान्य बात नहीं है। राजनैतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह केवल एक प्रशासनिक शिकायत नहीं, बल्कि सत्ता की अंदरूनी गलियों में पक रही खिचड़ी का परिणाम है स्वास्थ्य महकमा कांग्रेस के पाले में होने के कारण झामुमो और कांग्रेस के बीच अंदरूनी खींचतान व अविश्वास की जो सुगबुगाहट अक्सर सतह पर आती रहती है, यह पूरा मामला उसी शह-मात के खेल की एक कड़ी नज़र आता है। दूसरी ओर, उत्तम कुमार की शिकायत पर एसीबी कोर्ट ने स्वास्थ्य विभाग को भ्रष्टाचार में आरोपित प्रभारी निदेशक डॉ. जयति सिमलाई, डॉ. भुवन ज्योति, विनय कुमार और मनोज कुमार पर अभियोजन स्वीकृति देने के लिए पत्र लिखा है, जो कई महीने बीत जाने के बाद भी लंबित है। एक तरफ सरकार जेपीएससी, जेएसएससी के वरीय अधिकारियों, सीओ और थाना प्रभारियों पर एसीबी व सीआईडी को खुली छूट देकर कार्रवाई करवा रही है, तो दूसरी तरफ रिनपास के अधिकारियों पर अभियोजन स्वीकृति न देने से उसकी पारदर्शिता और ‘जीरो टॉलरेंस’ की नीति पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं, जिससे जमीनी स्तर पर सरकार की फजीहत हो रही है।

अगर गलियारों में तैरती चर्चाओं और अपुष्ट सूत्रों की मानें, तो रिनपास के भीतर महत्वपूर्ण फैसले किसी एक व्यक्ति द्वारा न लेकर एक खास आंतरिक समूह की सहमति से तय किए जाते हैं। सूत्रों का यह भी दावा है कि विभाग द्वारा बार-बार मांगे जा रहे जवाबों के बावजूद ऊपरी छत्रछाया का भरोसा होने के कारण इस प्रशासनिक सुगबुगाहट को लगातार नजरअंदाज किया जा रहा है। फाइलों की इस धीमी रफ्तार के पीछे मंशा शायद यही है कि समय बीतने के साथ मामला ठंडा पड़ जाए और जनता की यादों से गायब हो जाए।

आखिर रिनपास प्रबंधन पर इतने मेहरबान क्यों हैं साहब? कर्मचारियों के सवालों से गरमाई रांची की राजनीति

मामले में नया मोड़ तब आ गया जब रिनपास के ही कर्मचारी दबी ज़ुबान में यह सवाल उठाने लगे हैं कि आखिर तमाम गड़बड़ियों के बाद भी विभाग अस्पताल प्रबंधन पर इतना मेहरबान क्यों है? कर्मचारियों का कहना है कि जब तीन-तीन शिकायतकर्ताओं ने सबूतों और शपथ पत्रों के साथ सारे कच्चे-चिट्ठे खोल दिए हैं, फिर भी स्वास्थ्य विभाग द्वारा कोई सख्त कदम न उठाना समझ से परे है। विभागीय पत्राचार और नोटिसों के बावजूद ठोस कार्रवाई न होने से यह अंदेशा गहराने लगा है कि कहीं उच्च अधिकारियों की इस विशेष कृपा के पीछे कोई बड़ा प्रशासनिक संरक्षण तो काम नहीं कर रहा।

वहीं राजनीतिक पंडितों की मानें तो यह पूरा प्रकरण सिर्फ एक संस्था की अव्यवस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि यह राज्य के पूरे स्वास्थ्य प्रशासनिक तंत्र की कार्यशैली पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न खड़ा करता है। जानकारों का कहना है कि स्वास्थ्य विभाग जैसे बेहद संवेदनशील महकमे में अगर शपथ पत्र सौंपे जाने के बाद भी कार्रवाई रुकी हुई है, तो यह प्रशासनिक संरक्षण का एक रूप है। विश्लेषक मानते हैं कि ऐसे संवेदनशील मामलों का लंबित रहना किसी बड़े प्रशासनिक फेरबदल या अदृश्य राजनीतिक दबाव की ओर इशारा करता है।

रिनपास मुद्दे पर चुप क्यों है भाजपा?

इस पूरे घटनाक्रम में जो बात सबसे ज्यादा हैरान करती है, वह है मुख्य विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी की खामोशी। आमतौर पर छोटे-छोटे मुद्दों पर भी ताबड़तोड़ प्रेस कॉन्फ्रेंस कर सरकार को घेरने वाली भाजपा, इतने बड़े कथित मामले और सत्ताधारी गठबंधन के भीतर से ही उठती बगावती आवाजों के बावजूद आखिर इतनी खामोश क्यों है? राजनीतिक गलियारों में अब यह सवाल तेजी से तैरने लगा है कि विपक्ष का यह मौन किसी अंदरूनी राजनीतिक सहमति की ओर इशारा कर रहा है या फिर कोई भी इस उलझे हुए ताने-बाने में हाथ डालकर अपना हाथ नहीं जलाना चाहता। सवाल बेहद लाज़मी है कि जब आम जनता के पैसों और मानसिक स्वास्थ्य जैसी संवेदनशील सेवाओं से जुड़े मुद्दे पर जनप्रतिनिधि ही आंखें मूंद लें, तो फिर राज्य का आम नागरिक न्याय की उम्मीद आखिर किससे लगाए?

Disclaimer: लेख में उल्लिखित सभी बिंदु जांच के विषय हैं और संबंधित पक्षों को कानूनन अपनी बात रखने का पूरा अधिकार है।

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