द जन सभा | निरंजन भारती
विवादों में रिनपास संस्थान
झारखंड का जाना-माना मेडिकल संस्थान रांची तंत्रिका मनोचिकित्सा शिक्षा एवं संबद्ध विज्ञान संस्थान ( RINPAS) इन दिनों पैसों की हेराफेरी और प्रशासनिक गड़बड़ियों को लेकर चर्चा में है। आरोप है कि सरकारी नियमों का सहारा लेकर यहाँ जनता के पैसों का गलत इस्तेमाल किया जा रहा है। इसका सबसे ताजा मामला हाल ही में हुई एक सरकारी खरीद में सामने आया है, जिसने इस पूरे विवाद को हवा दे दी है।

बाजार दर से कई गुना ज्यादा दाम देने का दावा
खबरों के अनुसार, रिनपास प्रबंधन ने हाल ही में एक पावर जनरेटर सेट खरीदा है। चौंकाने वाली बात यह है कि हूबहू इसी मॉडल की कीमत रांची के खुले बाजार में अधिकृत डीलर के भुगतान किए रेट से तीन गुणा कम है। यह डीलर के कोटेशन और संस्थान के ऑर्डर की कॉपी से ही स्पष्ट हो जाता है कि रिनपास ने इस जेनरेटर के लिए बहुत बड़ी रकम का भुगतान कर दिया है।
जनरेटर की खरीद में बड़ा खेल?
संस्थान पर यह भी गंभीर आरोप लग रहा है कि पुनः उसी धांधली की पुनरावृत्ति के लिए 500 केवीए के एक नए जेनरेटर की खरीद की प्रक्रिया आरंभ कर दी गई है। अगर खुले बाज़ार की सामान्य कीमत से तुलना की जाए, तो इन जनरेटरों की कुल लागत काफी कम होनी चाहिए थी। लेकिन आरोप के मुताबिक, रिनपास ने बाजार दर से तीन गुना से भी अधिक की कीमत चुकाई है। इस आधार पर दावा किया जा रहा है कि जनरेटरों की खरीद में सरकारी खजाने को करोड़ों रुपये का चूना लगाने का एक बड़ा खेल हुआ है।
जेम पोर्टल की आड़ में खेल

आरोप है कि इस पूरी वित्तीय गड़बड़ी को अंजाम देने के लिए सरकारी खरीद पोर्टल GeM की बीडिंग प्रक्रिया का सहारा लिया गया, ताकि कागजी तौर पर इस काम को सही दिखाया जा सके। कांके रोड स्थित एक वेंडर द्वारा की गई इस जनरेटर की सप्लाई ने सीधे तौर पर जेम पोर्टल की व्यवस्था और अधिकारियों व ठेकेदारों के बीच की कथित साठगांठ पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
चुनिंदा कंपनियों पर मेहरबानी का अंदेशा
सूत्रों के अनुसार, जिन खास फर्मों को लगातार सारे काम सौंपे जा रहे हैं, उनका प्रोफाइल काफी संदेहास्पद है। अंदेशा जताया जा रहा है कि इनमें से कुछ फर्में सिर्फ कागजों पर चल रही हैं (यानी शैल कंपनियां हैं)। जेम पोर्टल पर टेंडर के दौरान सिर्फ दिखावे के लिए प्रतिस्पर्धा रची गई और एक ही सिंडिकेट द्वारा आपस में ही रेट फिक्स किए जाने का संगीन आरोप है। यह खेल कुछ खास लोगों के द्वारा लगभग पांच साल से टेंडर और अकाउंट्स का कार्य देखने की वजह से ही रहा है। मुख्य सचिव के आदेश के उलट संस्थान में इस संवेदनशील पद पर उनको तीन साल से अधिक समय से बैठा कर रखा गया है। रिपोर्ट मांगे जाने पर गोल गोल जवाब देकर स्वास्थ्य विभाग को बहलाया जा रहा है।
गोपनीय ओटीपी मांगकर साजिश ?
बताया जा रहा है कि पिछले कुछ वर्षों से रिनपास में जेम पोर्टल के जरिए करोड़ों रुपये की ऐसी संदिग्ध खरीदारी की गई है, जो बाजार दर से कई गुना अधिक कीमतों पर हुई है। अंदरूनी सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, इस पूरे खेल में रिनपास के खरीद अधिकारियों को महज आगे रखा जा रहा है और पर्दे के पीछे सक्रिय कुछ लोग अधिकारियों से गोपनीय ओटीपी मांगकर पूरे सिस्टम को अपने हिसाब से चला रहे हैं।
बिलों की जानबूझकर टुकड़ेबाज
गड़बड़ी करने वालों की चालाकी का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि जेम पोर्टल पर बिना टेंडर की सीधी खरीद की तय सीमा का पूरा नाजायज फायदा उठाया गया। एसी, घूमने वाली कुर्सियां, कॉन्फ्रेंस टेबल, स्मार्ट टीवी, लैपटॉप, सर्वर, डीप फ्रीजर और मरीजों के बेड जैसे सामानों के लिए तय सीमा से कम के सैकड़ों छोटे-छोटे बिल बनाकर पसंदीदा वेंडर्स को सीधे तौर पर लाभ पहुंचाने का आरोप है।

वित्त विभाग की भूमिका पर सवाल
रिनपास एक सरकारी स्वायत्त संस्थान है, जिसके खर्चों की जांच के लिए एक आंतरिक अकाउंट्स टीम होती है। अब सवाल यह उठ रहा है कि जब नियमों को दरकिनार कर बिलों के छोटे-छोटे टुकड़े किए जा रहे थे, तो संस्थान के इंटरनल फाइनेंस विभाग ने इन बिलों को बिना किसी रोक-टोक के पास कैसे कर दिया? यह वित्तीय लापरवाही की ओर इशारा करता है।
गायब और अनुपयोगी सामान
संस्थान में हुए इस वित्तीय घालमेल का सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि करोड़ों रुपये के बजट से खरीदे गए सामानों में से बहुत सारा सामान धरातल पर पूरी तरह से गायब बताया जा रहा है, जिसका कोई भौतिक रिकॉर्ड नहीं मिल रहा है। इसके अलावा, भारी मात्रा में खरीदे गए गैर-जरूरी उपकरण संस्थान के कमरों में बंद पड़े धूल फांक रहे हैं, जिससे मरीजों को कोई फायदा नहीं मिल रहा है।
मरीजों की बदहाली और मानवीय संवेदना
एक तरफ जहाँ अधिकारियों को चमकाने के लिए महंगे रिवॉल्विंग चेयर, स्मार्ट टीवी और गैर-जरूरी उपकरणों पर करोड़ों रुपये खर्च किए जाने की बात सामने आ रही है, वहीं दूसरी तरफ संस्थान में भर्ती मानसिक रूप से लाचार मरीजों की स्थिति दयनीय बनी हुई है। बुनियादी सुविधाओं, दवाइयों और साफ-सफाई की कमी के बीच यह विरोधाभास साफ दिखाता है कि मरीजों के हक की अनदेखी की जा रही है।
दातून से लेकर दवा तक, हर खरीद पर उठ रहे सवाल
खबर यह भी आ रही है कि संस्थान में केवल बड़े उपकरण ही नहीं, बल्कि रोजमर्रा के इस्तेमाल की चीजें भी बाजार दर से कहीं ज्यादा कीमतों पर खरीदी गई हैं। दावा किया जा रहा है कि मरीजों के लिए आने वाली दातून, दवाइयां, खाने-पीने का सामान और साफ-सफाई से जुड़ी हर छोटी-बड़ी चीज की खरीद में भारी गड़बड़ी हुई है। आंदोलनकारी नेताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि रिनपास में पिछले कुछ वर्षों में हुए हर एक सामान के बिल की गहराई से जांच होनी चाहिए, ताकि इस पूरे खेल की असली पोल जनता के सामने खुल कर आ सके।
आवाज उठाने पर धमकी का माहौल
सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक, रिनपास के भीतर मचे इस कथित भ्रष्टाचार और बदहाली के खिलाफ जो भी अंदरूनी सूत्र या कर्मचारी आवाज उठाने की कोशिश करता है, उसे रसूखदार लोगों द्वारा डराया और धमकाया जाता है। नौकरी से निकालने और गंभीर परिणाम भुगतने के इसी डर के कारण लंबे समय से इस मामले पर पर्दा पड़ा हुआ था।
सत्तापक्ष के नेताओं का आंदोलन
संस्थान के इस मनमाने रवैये और करोड़ों के घोटाले के खिलाफ अब खुद सत्तारूढ़ झारखंड मुक्ति मोर्चा के नेताओं ने न्याय की लड़ाई का बिगुल फूंक दिया है। झामुमो के केंद्रीय सदस्य समनूर अंसारी, रांची जिला संयोजक सदस्य सोनू मुंडा और प्रखंड अध्यक्ष नवीन तिर्की ने इस महालूट के खिलाफ लड़ाई लड़ रहे हैं।
मुख्यमंत्री तक पहुंची शिकायत
इस समूचे मामले और रिनपास की बदहाली के कथित प्रमाण विभागीय मंत्रियों, मुख्य सचिव और स्वयं मुख्यमंत्री तक को लिखित रूप में सौंप दिए गए हैं। आंदोलनकारी नेताओं ने इस पूरे मामले की उच्च स्तरीय जांच और दोषियों पर तत्काल कार्रवाई करने की मांग की है।
सामाजिक संगठनों का आक्रोश
इस खुलासे के बाद राज्य के प्रमुख सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधियों का गुस्सा बढ़ गया है। नागरिक समाज का स्पष्ट कहना है कि यह इलाज की उम्मीद में आने वाले गरीब और बेसहारा मरीजों के हक की खुली लूट है, और इसकी निष्पक्ष जांच कराकर दोषियों को सजा मिलनी चाहिए।
राजनीतिक पंडितों का विश्लेषण
राज्य की राजनीति पर नजर रखने वाले जानकारों का मानना है कि यह मामला सामान्य प्रशासनिक चूक से कहीं ज्यादा गंभीर है। जानकारों के मुताबिक, जब सत्तारूढ़ दल के अपने ही नेता अपनी सरकार के कार्यकाल में हो रही गड़बड़ियों के खिलाफ सड़क पर उतरने को मजबूर हो जाएं, तो यह साफ है कि व्यवस्था के भीतर कुछ गंभीर गड़बड़ चल रही है।
विपक्ष का रहस्यमयी मौन
इस पूरे मामले और राजनैतिक सरगर्मी के बीच सूबे के मुख्य विपक्षी दल की भूमिका भी हैरान करने वाली रही है, जिसने इस मुद्दे पर पूरी तरह से चुप्पी साध रखी है। राजनीतिक गलियारों में यह तीखा सवाल उठ रहा है कि जनता के पैसों की इस कथित लूट पर विपक्ष की जुबान क्यों बंद है?
विभागीय मंत्री और स्थानीय सांसद और विधायक की खामोशी पर भी सवाल
इस पूरे मामले में हैरान करने वाली बात यह है कि इतने बड़े आरोपों के बाद भी विभागीय मंत्री की ओर से अब तक कोई संज्ञान या ठोस कदम नहीं उठाया गया है। इसके साथ ही, स्थानीय सांसद और विधायक ने भी इस पूरे मुद्दे पर पूरी तरह से चुप्पी साध रखी है। जनहित से जुड़े इतने गंभीर विषय पर क्षेत्र के जनप्रतिनिधियों और जिम्मेदार मंत्री की यह बेरुखी न सिर्फ जनता के बीच चर्चा का विषय बनी हुई है, बल्कि इस कथित धांधली को लेकर चल रहे विवाद को और ज्यादा बढ़ा रही है।
खरीद प्रक्रिया से उप-प्रशासक ने झाड़ा पल्ला
इस पूरे मामले पर जब द जन सभा ने रिनपास के उप-प्रशासक मिथिलेश चौधरी से उनका पक्ष जानना चाहा, तो उन्होंने सीधे तौर पर इस खरीद प्रक्रिया से खुद को अलग कर लिया। उन्होंने कहा कि संस्थान में किसी भी सामान की खरीद के लिए एक विशेष कमेटी बनी हुई है, जिसके अध्यक्ष खुद प्रभारी निदेशक हैं। उप-प्रशासक ने स्पष्ट किया कि वह इस खरीद कमेटी के सदस्य नहीं हैं, इसलिए उन्हें इन फैसलों की कोई जानकारी नहीं दी जाती और वह इस विषय पर कुछ भी कहने की स्थिति में नहीं हैं। हालांकि रिनपास की प्रभारी निदेशक या जिम्मेवार अधिकारी द्वारा आरोपों को लेकर कोई स्पष्टीकरण या संस्थान का पक्ष भेजा जाता है, तो उसे The Jan Sabha हु- बहु प्रकाशित करेगा ।
