RINPAS NEWS: रिनपास निदेशक डॉ. जयति सिमलई मामले में चुप क्यों है झारखंड स्वास्थ्य विभाग? कोर्ट से जमानत पर हैं आरोपी

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द जन सभा | निरंजन भारती

रिनपास निदेशक के रसूख के आगे स्वास्थ्य विभाग लाचार क्यों ?

झारखंड के सबसे बड़े मानसिक स्वास्थ्य संस्थान RINPAS से एक ऐसा मामला सामने आया है जिसने राज्य की पूरी प्रशासनिक व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। संस्थान की प्रभारी निदेशक डॉ. जयति सिमलई के खिलाफ एक मरीज की मौत के मामले में न्यायिक प्रक्रिया शुरू होने के बाद राज्य के राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज हो गई है। झारखंड मुक्ति मोर्चा के स्थानीय नेता सोनू मुंडा की कानूनी लड़ाई ने अब उस पर्दे को उठा दिया है जिसके पीछे स्वास्थ्य महकमा लंबे समय से चैन की नींद सो रहा था।

रिनपास परिसर में तेज रफ्तार कार की चपेट में आने से असहाय मरीज की हो गई थी दर्दनाक मौत

यह पूरा मामला साल 2022 का है, जब रिनपास परिसर के भीतर ही महिला वार्ड में एक कार दुर्घटना घटी थी। रिनपास के नियमों के अनुसार मानसिक रूप से विक्षिप्त मरीजों की सुरक्षा के लिए इस वार्ड में किसी भी निजी वाहन का जाना पूरी तरह वर्जित है। लेकिन आरोप है कि डॉ. जयति सिमलई द्वारा लापरवाही और तेज रफ्तार से चलाई जा रही बड़ी गाड़ी की चपेट में आने से वहां भर्ती एक असहाय महिला मरीज तैरू निशा गंभीर रूप से घायल हो गई थी । गाड़ी की टक्कर इतनी भयानक थी कि पीड़ित मरीज की कई हड्डियां टूट गईं और इलाज के दौरान रिम्स में उसने दम तोड़ दिया।

हाँ, मेरी ही गाड़ी की चपेट में आ गई थी मरीज

इस मामले में सबसे हैरान करने वाला मोड़ खुद डॉ. जयति सिमलई का अपना लिखित स्पष्टीकरण है। तत्कालीन निदेशक द्वारा जारी कारण बताओ नोटिस के जवाब में डॉ. सिमलई ने 16 मार्च 2022 को लिखित रूप से यह स्वीकार किया था कि मृतका तैरू निशा की मौत उसी कार दुर्घटना से हुई थी जिसे वह स्वयं महिला वार्ड के भीतर चला रही थीं। उन्होंने दलील दी थी कि उस दिन उनकी तबीयत ठीक नहीं थी, इसलिए वह पैदल चलने के बजाय अपनी निजी कार लेकर प्रतिबंधित वार्ड के अंदर चली गईं। सवाल यह उठता है कि क्या किसी डॉक्टर की तबीयत खराब होना उन्हें नियमों को तोड़ने और मरीजों की जान जोखिम में डालने का अधिकार दे देता है?

जज सुश्री ऋत्विका सिंह की अदालत ने तय किए आरोप

हालांकि पुलिस ने शुरुआत में साक्ष्यों की कमी बताते हुए इस मामले को रफा-दफा करने की कोशिश की थी, लेकिन अदालत में न्याय की आंखें खुली रहीं। रांची की न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी ऋत्विका सिंह की अदालत ने चश्मदीद गवाहों के बयानों और पोस्टमार्टम रिपोर्ट को देखने के बाद डॉ. जयति सिमलई को उक्त घटना का दोषी माना। माननीय न्यायालय ने आरोपी डॉक्टर के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 279 और धारा 304 (A) के तहत मुकदमा चलाने का आदेश जारी किया।

जब रिनपास की निदेशक ने कोर्ट में जाकर टेक दिए घुटने

अदालती आदेश के बाद रसूख की आड़ में चल रहा लुका-छिपी का खेल इसी साल खत्म हो गया। कोर्ट के सख्त रुख के बाद आरोपी डॉ. जयति सिमलई को निर्धारित समय पर माननीय न्यायालय के समक्ष सशरीर हाजिर होकर बाकायदा आत्मसमर्पण करना पड़ा। यह अपने आप में एक अनोखा प्रशासनिक दृश्य है, जहाँ राज्य के इतने बड़े चिकित्सा संस्थान को संभालने वाली निदेशक खुद कानून की नजर में एक सरेन्डर कर चुकी आरोपी हैं, लेकिन इसके बावजूद वे शान से निदेशक की मुख्य कुर्सी पर बैठी हुई हैं।

बेल पर चल रहीं निदेशक को कुर्सी का संरक्षण क्यों?

सूत्रों के अनुसार इस मामले में हुए खुलासे के अनुसार,प्रशासनिक लीपापोती को देखते हुए राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के आदेश के बाद मामले की कमान जजों की एक विशेष और अलग बेंच को सौंप दी गई थी, जिसने इस पूरे प्रकरण की नए सिरे से जांच शुरू की। इस नई न्यायिक प्रक्रिया के तहत अदालत के समक्ष तमाम गवाहों के साथ-साथ खुद आरोपी प्रभारी निदेशक डॉ. जयति सिमलई को भी खड़ा कर उनकी गवाही दर्ज कराई गई। मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए माननीय जजों की इस स्पेशल बेंच ने केवल फाइलों में दर्ज सरकारी दावों पर भरोसा नहीं किया, बल्कि स्वयं रिनपास के प्रतिबंधित महिला वार्ड के ग्राउंड-जीरो पर जाकर उस जगह का बारीकी से मुआयना किया जहाँ उस बेसहारा मरीज को कुचला गया था। अब राजनीतिक पंडित और कानून के जानकार सबसे बड़ा और चुभता हुआ सवाल यह उठा रहे हैं कि जो अधिकारी मानवाधिकार आयोग की रडार पर हो, जिसके खिलाफ जजों की अलग बेंच जांच कर रही हो और जो खुद अदालत से बेल के सहारे बाहर घूम रही हो, उसे रिनपास जैसे प्रतिष्ठित संस्थान का सर्वोच्च बॉस बनाए रखकर झारखंड का स्वास्थ्य महकमा आखिर न्याय का कौन सा नया स्वरूप पेश करना चाहता है?

स्वास्थ्य विभाग में नियम गए तेल लेने!

इस पूरे विवाद का सबसे गंभीर पहलू प्रशासनिक नियमों की अनदेखी है। झारखंड सरकार द्वारा 5 अप्रैल 2016 को प्रकाशित सरकारी सेवक वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील नियमावली, 2016 के भाग-IV के नियम 9 में साफ लिखा है कि यदि किसी सरकारी सेवक के विरुद्ध कोई आपराधिक मामला न्यायालय में विचारण के अधीन हो, तो निष्पक्ष जांच के लिए उसे तुरंत प्रभाव से पद से निलंबित किया जाना चाहिए। लेकिन रिनपास के मामले में स्वास्थ्य विभाग ने इस आधिकारिक गजट और स्थापित नियमों की खुलेआम अवहेलना की है।

सचिवालय की इस रहस्यमयी खामोशी का राज क्या है?

इस संवेदनशील मामले में मुख्यमंत्री सचिवालय की ओर से स्वास्थ्य विभाग के अपर मुख्य सचिव को त्वरित और समुचित कार्रवाई हेतु निर्देश भेजे जा चुके हैं। इसके बावजूद, विभाग के अपर मुख्य सचिव और स्वयं स्वास्थ्य मंत्री की ओर से इस मुद्दे पर बरती जा रही खामोशी कई गंभीर संदेहों को जन्म दे रही है। हमारे सूत्रों और राजनीतिक पंडितों का कहना है कि आरोपी अधिकारी को पर्दे के पीछे से बड़े रसूखदारों का संरक्षण प्राप्त है। राजनीतिक पंडित सवाल उठा रहे हैं कि आखिर ऐसी क्या राजनीतिक मजबूरी या लाचारी है कि सरकार एक गंभीर आपराधिक मामले में घिरीं और कोर्ट में सरेंडर कर चुकी अधिकारी को रिनपास के प्रभारी निदेशक पद से हटाने में पूरी तरह हिचकिचा रही है?

क्या रसूखदारों के लिए बदल जाता है कानून?

यह मामला न केवल एक बेसहारा मरीज की मौत से जुड़ा है, बल्कि यह राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था की विश्वसनीयता को भी कसौटी पर कसता है। कानून के जानकार मानते हैं कि स्थापित गजट नियमों के विपरीत जाकर किसी भी आरोपी अधिकारी को ऐसे संवेदनशील पद पर बनाए रखना राज्य सरकार की जीरो टॉलरेंस की नीति पर गहरा आघात है। अब देखना यह होगा कि कोर्ट के सख्त रुख और लगातार बढ़ते सार्वजनिक दबाव के बीच झारखंड का स्वास्थ्य विभाग इस गहरी नींद से कब जागता है और नियमों के तहत निष्पक्ष कार्रवाई सुनिश्चित करता है।

रसूखदारों के आगे झुकने वाली व्यवस्था के खिलाफ यह मेरी लड़ाई है : सोनू मुंडा

झामुमो नेता और समाजसेवी सोनू तिर्की उर्फ मुंडा ने व्यवस्था पर सीधा प्रहार करते हुए बेहद आक्रामक तेवर में कहा कि मेरी यह लड़ाई सिर्फ एक प्रशासनिक लापरवाही की नहीं, बल्कि सत्ता और पैसे के मद में चूर एक रसूखदार अधिकारी द्वारा कानून का मखौल उड़ाने की है। जब आरोपी डॉक्टर खुद लिखित में अपना गुनाह कबूल कर चुकी हैं और अदालत ने उनके खिलाफ मुकदमा चलाने का आदेश देकर उन्हें कोर्ट में सरेंडर करने पर मजबूर कर दिया है, तो फिर स्वास्थ्य विभाग किस बेशर्मी से उन्हें निदेशक की वीआईपी कुर्सी पर बिठाकर गवाहों को डराने-धमकाने की खुली छूट दे रहा है? क्या झारखंड में कानून सिर्फ गरीबों को जेल भेजने के लिए है और रसूखदारों के लिए गजट के नियम बदल जाते हैं? मैं साफ कर देना चाहता हूं कि जब तक रिनपास की इस दागी निदेशक को बर्खास्त कर सलाखों के पीछे नहीं भेजा जाता, तब तक मैं चैन से नहीं बैठूंगा।

अंतिम फैसला अदालत करेगी

डॉ. जयति सिमलई के खिलाफ मामला न्यायालय में विचाराधीन है। आरोपों पर अंतिम निर्णय अदालत द्वारा ही दिया जाएगा।

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