RINPAS NEWS: 20 साल से स्थायी निदेशक क्यों नहीं? स्वायत्तता का गला घोंट रही सरकार!

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मशीन आ गई, ऑपरेटर कहाँ है मंत्री जी?

कांके स्थित राज्य के एकमात्र मानसिक स्वास्थ्य संस्थान रिनपास (RINPAS) में बुधवार को स्वास्थ्य मंत्री डॉ. इरफान अंसारी ने बड़े ही तामझाम के साथ ‘प्रोजेक्ट मानस’ के तहत करोड़ों रुपये की ‘ब्रेन्सवे डीप ट्रांसक्रेनियल मैग्नेटिक स्टिमुलेशन’ (DTMS) मशीन का उद्घाटन तो कर दिया, लेकिन इस चमक-दमक के पीछे की कड़वी हकीकत बेहद भयावह है। स्वास्थ्य मंत्री ने इसे मानसिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में एक नया मील का पत्थर बताया, जिसे रोटरी फाउंडेशन की मदद और सीसीएल के सीएसआर फंड से स्थापित किया गया है। लेकिन सबसे बड़ा और तीखा सवाल यह उठता है कि करोड़ों रुपये की लागत से खरीदी गई ये अत्याधुनिक मशीनें आखिरकार किसके भरोसे संचालित होंगी? जब संस्थान में इस मशीन को चलाने के लिए कोई प्रशिक्षित जनशक्ति (Trained Manpower) ही मौजूद नहीं है, तो क्या यह महज एक और चुनावी स्टंट या कागजी विकास है? हैरान करने वाली बात यह है कि लाखों की लागत से आई एमआरआई (MRI) मशीन सालों से यहाँ धूल फांक रही है और अनुपयोगी पड़ी है। क्या सरकार और स्वास्थ्य विभाग का पूरा ध्यान सिर्फ नए-नए टेंडर निकालने, मशीनें खरीदने और आधारभूत संरचना (Infrastructure) का ढांचा खड़ा करने पर ही टिका है, न कि मरीजों के वास्तविक इलाज पर? बिना डॉक्टरों, टेक्नीशियन और विशेषज्ञों के, केवल खाली इमारतें खड़ी कर देने और फीते काट देने से संस्थान की सेवा की बदतर गुणवत्ता आखिर कैसे बदलेगी? जनता यह पूछ रही है कि इन निष्प्राण मशीनों का तमाशा दिखाकर किसे गुमराह किया जा रहा है?

20 साल से प्रभारी के भरोसे स्वायत्तता का चीरहरण, 650 में से 450 पद खाली, नियुक्तियों से क्यों भाग रही सरकार?

​इस भव्य उद्घाटन कार्यक्रम के बाद जब पत्रकारों ने स्वास्थ्य मंत्री को जमीनी हकीकत का आईना दिखाया, तो वह बुनियादी सवालों के घेरे में बुरी तरह घिर गए और उनके पास कोई ठोस जवाब नहीं था। सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) के स्पष्ट और कड़े आदेशानुसार रिनपास को एक पूर्णतः स्वायत्तशासी (Autonomous) संस्थान का दर्जा दिया गया था ताकि इसका प्रबंधन निष्पक्ष और मजबूत हो। इसके बावजूद, यह पूरे राज्य के लिए बेहद शर्मनाक और आपराधिक लापरवाही है कि पिछले 20 वर्षों (वर्ष 2007 में डॉ. पीके चक्रवर्ती के जाने के बाद से) में यहाँ एक स्थाई निदेशक तक की बहाली नहीं की जा सकी है। संस्थान में स्वीकृत लगभग 650 स्थाई पदों में से 450 से अधिक पद वर्षों से रिक्त पड़े हैं, जिन्हें भरने का पूरा अधिकार रिनपास प्रबंधकारिणी समिति और निदेशक को ही है। माननीय मंत्री जी को राज्य की जनता के सामने यह स्पष्ट करना होगा कि क्या सरकार जानबूझकर रिनपास में स्थाई नियुक्तियां नहीं करना चाहती? इस प्रतिष्ठित और स्वायत्त संस्थान को जानबूझकर प्रभारी व्यवस्था के भरोसे छोड़कर पंगु बनाने के पीछे आख़िर क्या मंशा है? आरोप तो यहाँ तक लग रहे हैं कि प्रभारी निदेशकों ने अपनी कुर्सी बचाने के चक्कर में संस्थान के सारे अधिकारों को सरकार और स्वास्थ्य विभाग के बाबुओं के सामने पूरी तरह सरेंडर कर दिया है, ताकि अंदरूनी स्तर पर मनमानी का खेल बदस्तूर जारी रह सके।

गंभीर मामलों और ‘हत्या’ के आरोपी को अभयदान’, सरकारी गजट के नियमों को ठेंगा दिखा रहा स्वास्थ्य विभाग!

​रिनपास की प्रशासनिक सड़न का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इसकी वर्तमान प्रभारी निदेशक डॉ. जयति सिमलाई खुद भ्रष्टाचार, भारी अनियमितताओं और कोर्ट कचहरी के मामलों में आकंठ डूबी हुई हैं। सबसे सनसनीखेज मामला यह है कि उन पर एक मरीज की हत्या करने का गंभीर आरोप कोर्ट द्वारा तय किया जा चुका है और वह वर्तमान में सिर्फ बेल पर बाहर हैं। झारखंड सरकार के आधिकारिक गजट में यह साफ और स्पष्ट उल्लेख है कि यदि किसी भी सरकारी अधिकारी या कर्मचारी पर न्यायालय द्वारा आपराधिक मामलों में आरोप तय कर दिया जाता है, तो उसे तत्काल प्रभाव से सस्पेंड करने का प्रावधान है। ऐसे में सवाल उठता है कि सरकार और स्वास्थ्य विभाग इस संगीन मामले पर अब तक सांप सूंघे क्यों बैठा है? स्वास्थ्य विभाग ने कुछ समय पहले डॉ. सिमलाई से 15 दिनों के भीतर स्पष्टीकरण तो मांगा था, लेकिन उस स्पष्टीकरण के बाद पूरी फाइल को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया। सत्ताधारी दल झामुमो (JMM) के कार्यकर्ताओं और स्थानीय नेताओं द्वारा इस बाबत कई बार लिखित आवेदन दिए जाने के बावजूद कोई कार्रवाई क्यों नहीं हुई? क्या स्वास्थ्य विभाग केवल औपचारिकता के लिए नोटिस की ‘इतिश्री’ कर लेता है, या सरकार से किसी वास्तविक प्रशासनिक सुधार की उम्मीद भी की जा सकती है? कानून की धज्जियां उड़ाकर एक दागी अधिकारी को इतने संवेदनशील पद पर बनाए रखना सीधे तौर पर सत्ता के संरक्षण की ओर इशारा करता है।

जिसने देश को पहला ‘MD in Psychiatry’ दिया, वहाँ 6 साल से पढ़ाई पूरी तरह ठप!

​रिनपास का इतिहास बेहद गौरवशाली रहा है। यह वही ऐतिहासिक और प्रतिष्ठित संस्थान है जिसने पूरे देश को पहला ‘एमडी इन साइकियाट्री’ (MD in Psychiatry) जैसा उच्च विशेषज्ञ डॉक्टर दिया था। लेकिन आज इसी गौरवशाली संस्थान की साख को पूरी तरह मटियामेट कर दिया गया है। पिछले 6 साल से भी अधिक समय से यहाँ उच्च शिक्षा, शोध और मेडिकल की पढ़ाई पूरी तरह बंद पड़ी है। एक तरफ जहाँ पूरे राज्य और देश में मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों और डॉक्टरों की भारी किल्लत है, वहीं दूसरी तरफ इस राष्ट्रीय स्तर के संस्थान में शैक्षणिक सत्रों को ताले में बंद रखना किसकी विफलता है? इस विनाशकारी शैक्षणिक पतन के लिए आखिर किसे जिम्मेदार ठहराया जाएगा? असलियत यह है कि आज रिनपास के अधिकारी और स्वास्थ्य विभाग के कर्ता-धर्ता अपनी व्यक्तिगत ‘कमाई’ के लिए सिर्फ भवनों के निर्माण और इंफ्रास्ट्रक्चर पर पैसा पानी की तरह बहा रहे हैं, क्योंकि उसमें मोटा कमीशन है। जबकि, पहले से बने हुए चमचमाते भवनों और करोड़ों के उपकरणों को संचालित करने के लिए जरूरी दक्ष मानव संसाधन (Manpower) को जानबूझकर बहाल नहीं किया जा रहा है ताकि संस्थान हमेशा के लिए दूसरों पर निर्भर रहे।

ब्लैकलिस्टेड ‘समानता सिक्योरिटी एजेंसी’ पर मेहरबानी की इंतहा: सुरक्षा से लेकर नर्स बहाली तक में करोड़ों का वारा-न्यारा!

​संस्थान में भ्रष्टाचार का सबसे बड़ा और खुला खेल आउटसोर्सिंग के नाम पर खेला जा रहा है। ‘समानता सिक्योरिटी एजेंसी’ ने रिनपास में सुरक्षा सेवा के दौरान व्यापक गड़बड़ियां और घोटाले किए थे। इस एजेंसी ने गरीब गार्ड्स को न तो न्यूनतम मजदूरी दी, न ईपीएफ (EPF) दिया और न ही बोनस का भुगतान किया। सुरक्षाकर्मियों और कांग्रेस प्रखंड अध्यक्ष संजर खान की शिकायत के बाद, इस दागी एजेंसी को वर्ष 2025 में बीएयू (BAU) द्वारा बाकायदा ब्लैकलिस्ट भी कर दिया गया था। नियमतः इस एजेंसी पर कठोर कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए थी, लेकिन रिनपास के रहमों-करम पर इस ब्लैकलिस्टेड एजेंसी को दंड देने के बजाय और बड़ा इनाम दे दिया गया! इसे रिनपास में ‘मैनपावर सप्लाई’ का काम सौंप दिया गया, जिसके तहत अब यह एजेंसी नर्सेज, कंप्यूटर ऑपरेटर आदि की आपूर्ति कर रही है। यहाँ भी इसका शोषण जारी है और यह नर्सेज को तय मानक से बेहद कम वेतन दे रही है। हद तो तब हो गई जब ब्लैकलिस्ट होने के बावजूद इस एजेंसी को रांची सदर अस्पताल की सुरक्षा सेवा सहित सूबे के अन्य कई जिलों में धड़ाधड़ नए सरकारी काम सौंप दिए गए। झामुमो के प्रखंड अध्यक्ष नवीन तिर्की ने इस महाघोटाले पर तीखे सवाल उठाए हैं कि आखिर स्वास्थ्य विभाग इस दागी और ब्लैकलिस्टेड एजेंसी पर इतना मेहरबान क्यों है? आउटसोर्सिंग के माध्यम से सैकड़ों की संख्या में सफाईकर्मी, सुरक्षाकर्मी और नर्सों को मोटी रकम के एवज में बहाल कर जो अवैध कमाई का नया जरिया बनाया गया है, उसने रिनपास को पूरी तरह से लूट का अड्डा बना दिया है। ​यह पूरा गंभीर और भ्रष्टाचार से सना मामला अब मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के संज्ञान में भी आ चुका है। ऐसे में देखना यह होगा कि मुख्यमंत्री इस सड़े हुए सिस्टम पर सीधे हंटर चलाते हैं या रिनपास ऐसे ही प्रभारी व्यवस्था, घोटालों और बिना डॉक्टरों की खाली इमारतों के आंसू रोता रहेगा!

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