Tribal Against Delimitation : परिसीमन के खिलाफ आदिवासियों का उलगुलान का ऐलान, 30 अगस्त का रांची में होगा महा जुटान

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द जन सभा |  डेस्क

क्या किसी समाज का राजनीतिक वजूद सिर्फ़ नक्शे पर खिंची चंद नई रेखाओं से तय हो सकता है? झारखंड की सियासत में इन दिनों यही सवाल हवा में तैर रहा है। बात सिर्फ सीटों के कम या ज्यादा होने की नहीं है, बात उस संवैधानिक ढाल की है जो देश के आदिवासियों को संसद और विधानसभाओं में अपनी आवाज बुलंद करने का हक देती है। मोराबादी स्थित पूर्व मंत्री बंधु तिर्की के आवास पर जुटी झारखंड के विभिन्न जिलों की नुमाइंदगी सिर्फ नेताओं का जमघट नहीं थी, यह आने वाले उस तूफान की आहट थी जो 2026 के प्रस्तावित परिसीमन को लेकर उठने वाला है। इस बार 9 अगस्त को मनाए जाने वाले विश्व आदिवासी दिवस का जश्न पारंपरिक ढोल-नगाड़ों के साथ-साथ राजनीतिक सवाल पर केंद्रित होग परिसीमन और आदिवासी राजनीतिक प्रतिनिधित्व की रक्षा। समाज को यह समझाने की कोशिश है कि अगर आज अपने अधिकारों को लेकर जागरूकता नहीं दिखाई, तो कल के नक्शों में उनकी राजनीतिक मौजूदगी धुंधली हो सकती है।

राजनीति अक्सर कागज़ों पर खिंची रेखाओं से शुरू होती है, लेकिन उसका असली असर इंसान की पहचान और उसकी आवाज़ पर पड़ता है और यही डर आज झारखंड के आदिवासी समाज को सड़कों पर उतरने को मजबूर कर रहा है। बंधु तिर्की के आवास पर हुई अहम बैठक में सर्वसम्मति से यह फैसला लिया गया कि इस बार 9 अगस्त को विश्व आदिवासी दिवस सिर्फ़ एक सांस्कृतिक उत्सव नहीं, बल्कि परिसीमन एवं आदिवासी राजनीतिक प्रतिनिधित्व की रक्षा का एक संवैधानिक मोर्चा होगा। 6 से 18 अगस्त तक चलने वाला 24 जिलों का गहन जनसंपर्क अभियान 30 अगस्त को राँची के मोराबादी मैदान में एक विशाल आदिवासी एकता महाजुटान रैली का रूप लेगा, जहाँ समाज के हर तबके को एक मंच पर लाने की रणनीति है। इस पूरे घटनाक्रम पर पूर्व मंत्री बंधु तिर्की का बयान सामने आया उन्होंने चेताया कि प्रस्तावित परिसीमन आदिवासी समाज की राजनीतिक मौजूदगी और संवैधानिक अधिकारों पर एक सीधा ख़तरा बन सकता है, ऐसे में अगर आज तथ्यों और संवैधानिक जानकारियों के साथ गाँव-गाँव तक अलख नहीं जगाई गई, तो कल सत्ता के गलियारों में आदिवासी आवाज़ों को बेअसर होने से कोई रोक नहीं पाएगा।

झारखंड की धरती का इतिहास हमेशा से अपनी अस्मिता, ज़मीन और स्वायत्तता की रक्षा के लिए लड़े गए वीर संग्राणों से सिंचित रहा है चाहे वह 1784 में बाबा तिलका मांझी का ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ पहला तीर चलाना हो, 1855 में सिद्धू-कान्हू का ऐतिहासिक हूल क्रांति शंखनाद हो, या फिर भगवान बिरसा मुंडा का उलगुलान आंदोलन। आदिवासियों ने हर दौर में अपनी जल, जंगल, ज़मीन और स्वशासन माझी-परगाना व पड़हा व्यवस्था के लिए सर्वस्व न्योछावर किया है। 1938 में जयपाल सिंह मुंडा द्वारा उठाई गई अलग झारखंड राज्य की आवाज़ दशकों के लंबे संघर्ष के बाद 2000 में साकार तो हुई, लेकिन इतिहास गवाह है कि आदिवासियों को जब-जब लगा कि उनकी जल-जंगल-ज़मीन और संवैधानिक पहचान को मिटाने की कोशिश हो रही है, तब-तब इस समाज ने ग्राम सभाओं से लेकर सड़कों तक ऐतिहासिक प्रतिरोध दर्ज कराया है।

आज जब फिर से परिसीमन की सुगबुगाहट तेज़ है, तो इस विरोध की जड़ें आदिवासी समाज की वाजिब आशंकाओं में छिपी हुई हैं। परिसीमन का सीधा नियम आबादी का अनुपात होता है, लेकिन झारखंड जैसे राज्यों में निरंतर विस्थापन, औद्योगिक विकास के नाम पर बेदखली और बाहरी आबादी की आमद के कारण आदिवासियों का जनसंख्या अनुपात कागज़ों पर कम हुआ है। ऐसे में यदि केवल जनसंख्या को पैमाना बनाया गया, तो लोकसभा और विधानसभा में आदिवासियों के लिए आरक्षित सीटों की संख्या में बड़ी कटौती हो जाएगी, जिससे सत्ता और नीति-निर्माण में उनकी राजनीतिक हिस्सेदारी हमेशा के लिए सिमट जाएगी। इसके अलावा, 5वीं अनुसूची के तहत मिलने वाले संवैधानिक संरक्षण और पारंपरिक ग्राम सभाओं के स्वशासन अधिकारों पर भी इस भौगोलिक फेरबदल का प्रतिकूल प्रभाव पड़ने का ख़तरा है और यही वजह है कि आदिवासी समाज इसे सिर्फ चुनावी फ़ेरबदल नहीं, बल्कि अपने अस्तित्व पर आने वाली बड़ी आंच के रूप में देख रहा है।

रणनीति को अमलीजामा पहनाने और आंदोलन की रूपरेखा तय करने के लिए आयोजित इस महत्वपूर्ण बैठक में झारखंड के प्रमुख आदिवासी चेहरों और सामाजिक कार्यकर्ताओं की मौजूदगी दर्ज की गई। पूर्व मंत्री बंधु तिर्की की अगुवाई में हुई इस बैठक में प्रखर सामाजिक कार्यकर्ता दयामनी बारला, पूर्व मेयर रमा खलखो, शशि पन्ना, अनिल उरांव, दीनबंधु बोइपोई, विनय उरांव, बिन्सय मुंडा, नीरज भोगता, विकास उरांव, सेल्सटीन कुजूर, रिंकू कच्छप, आर्सेन तिर्की, अनूप लकड़ा, सुनील मिंज, विकी धान, विजय भोगता, दिनेश सिंह और निश्चल सोय सहित राज्य के सभी 24 जिलों से आए विभिन्न जनसंगठनों के प्रतिनिधि, पारंपरिक ग्राम प्रधान और छात्र-युवा नेता प्रमुख रूप से शामिल थे।

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