Jharkhand Plane Crash News : जब एयर एम्बुलेंस ने तोड़ दिया दम, तब सरकार ने खोला आश्वासनों का मरहम!

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The Jan Sabha राँची/ विशेष संवाददाता: झारखंड मंत्रालय की चहारदीवारी के भीतर आजकल संवेदनाओं का मौसम है। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने चतरा एयर एम्बुलेंस हादसे में जान गंवाने वालों के परिजनों से मुलाकात की। माहौल में ‘आत्मीयता’ की ऐसी चादर बिछी थी कि कागजों पर लिखे दुख भी शायद मुस्कुरा उठे होंगे। मुख्यमंत्री ने परिजनों की बातें इतने ध्यान से सुनीं, मानो उनके सुनते ही चतरा के जंगलों में गिरा वह विमान फिर से उड़ान भर लेगा। परिजनों ने सरकारी नौकरी और मुआवजे का ‘ज्ञापन’ सौंपा है वही ज्ञापन, जो हमारे लोकतंत्र में उम्मीदों की आखिरी चिठ्ठी और सरकारी अलमारियों का पहला भोजन होता है।

मौके पर मुख्यमंत्री ने ‘यथोचित मदद’ का भरोसा दिया है। सरकारी शब्दकोश में ‘यथोचित’ एक ऐसा अद्भुत शब्द है, जो प्यासे को रेगिस्तान में सुराही का सपना दिखाने जैसा है। मंत्रीगण भी बगल में इस मुद्रा में विराजमान थे, जैसे वे एयर एम्बुलेंस की सुरक्षा खामियों की नहीं, बल्कि परिजनों के धैर्य की परीक्षा ले रहे हों। आश्वासन का यह मरहम तब लगाया जा रहा है, जब सात घर उजड़ चुके हैं। अब देखना यह है कि यह मदद फाइलों के गलियारे में ‘लैंड’ करती है या अगले चुनावी मौसम तक हवा में ही गोते खाती रहेगी।

याद दिला दें कि 23 फरवरी 2026 को रांची से दिल्ली की वह उड़ान इलाज के लिए नहीं, बल्कि नियति के क्रूर मजाक के लिए भरी गई थी। बर्न इंजरी से जूझ रहे संजय कुमार को क्या पता था कि जिस एम्बुलेंस को उनकी जान बचाने का जिम्मा मिला है, वह खुद ‘लाचार’ है। चतरा के आसमान में उड़ता वह जहाज सिस्टम की जर्जर हालत का प्रतीक बनकर जमीन पर आ गिरा। उस आग ने न सिर्फ मरीज, बल्कि उनकी पत्नी अर्चना देवी, भांजे ध्रुव, डॉक्टर, पैरामेडिक और दोनों पायलटों के सपनों को राख कर दिया। सात जिंदगियां धुएं में तब्दील हो गईं, और पीछे छूट गया सिर्फ एक सरकारी प्रेस नोट।


व्यंग्य तो यह है कि जिस राज्य में मरीज को दिल्ली ले जाने की नौबत इसलिए आती है क्योंकि यहाँ के अस्पताल ‘रिफर सेंटर’ बनकर रह गए हैं, वहाँ एयर एम्बुलेंस की सुरक्षा पर सवाल उठाना भी गुनाह है। अगर राँची में ही दिल्ली जैसा इलाज होता, तो शायद चतरा का वह जंगल आज खामोश न होता। लेकिन साहब, यहाँ इलाज से ज्यादा आसान मुआवजा देना है और सुरक्षा से ज्यादा आसान सांत्वना जताना है। ज्ञापन सौंप दिया गया है, फोटो खिंचवा ली गई है, अब बस सिस्टम के जागने का इंतज़ार है, जो अक्सर अगले हादसे के बाद ही अपनी नींद पूरी करता है।

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