द जन सभा | निरंजन भारती
झारखंड के सबसे प्रतिष्ठित मानसिक स्वास्थ्य संस्थान, रांची तंत्रिका मनोचिकित्सा एवं संबद्ध विज्ञान संस्थान में डॉक्टरों की सुरक्षा को लेकर एक बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। संस्थान के न्यूरोसाइकियाट्रिस्ट डॉ. सिद्धार्थ सिन्हा ने प्रभारी निदेशकज्योति शिमलई को तीखा और आधिकारिक ईमेल भेजकर अपनी जान का खतरा बताया है। रविवार को भेजे गए इस पत्र में डॉक्टर ने संस्थान के भीतर अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करने और तुरंत दो सुरक्षाकर्मी तैनात करने की मांग की है। डॉ. सिन्हा के मुताबिक, सुरक्षा चिंताओं को लेकर निदेशक को भेजा गया यह उनका दूसरा ईमेल है, लेकिन प्रबंधन की ओर से इस पर अब तक कोई संज्ञान नहीं लिया गया है। चिकित्सक ने अपने पत्र में संस्थान के नेतृत्व और प्रशासनिक रवैये पर बेहद गंभीर और तीखे सवाल उठाए हैं।

डॉ. सिन्हा ने आरोप लगाया कि सुरक्षा और स्वास्थ्य संबंधी चिंताओं पर ध्यान देने के बजाय उन्हें निदेशक के फोन और सोशल मीडिया हैंडल से ब्लॉक कर दिया गया है। उन्होंने प्रबंधन पर भेदभाव का आरोप लगाते हुए कहा कि झारखंड स्वास्थ्य विभाग से रिनपास में तैनात किए गए डॉक्टरों के साथ पक्षपातपूर्ण व्यवहार किया जा रहा है। पत्र में मांग की गई है कि जिस तरह संस्थान के अन्य अधिकारियों की सुरक्षा में गार्ड तैनात हैं, उसी तरह उन्हें भी तत्काल दो सुरक्षाकर्मी मुहैया कराए जाएं। डॉ. सिन्हा ने इस पूरे मामले को बेहद संवेदनशील बताते हुए संस्थान से लिखित रूप में जवाब भी मांगा है ।
गौरतलब हो कि इस पूरे विवाद के असली सूत्रधार कोई और नहीं, बल्कि खुद रिनपास की प्रभारी निदेशक हैं। राजनीतिक पंडितों के अनुसार परदे के पीछे का मूल खिलाड़ी माना जा रहा है। डॉक्टर सिद्धार्थ सिन्हा का रविवार को भेजा गया ईमेल साफ बयां करता है कि ओपीडी परिसर में जो मारपीट, धक्का-मुक्की और सरेआम गाली-गलौज का नंगा नाच हुआ, उसे रोकने के बजाय निदेशक महोदया ने जानबूझकर मूकदर्शक बने रहना चुना। झारखंड स्वास्थ्य विभाग से आए डॉक्टरों को सुरक्षा देने के बजाय उनका फोन ब्लॉक कर देना और उनकी सुरक्षा की गुहार से पूरी तरह मुंह मोड़ लेना यह साबित करता है कि प्रशासनिक नायक मिथिलेश कुमार चौधरी रिनपास को जिस गंदी राजनीति और भ्रष्टाचार से मुक्त कराना चाहते हैं, उसका असल केंद्र कहां है। जब संस्थान की मुखिया ही वीआईपी कल्चर में मग्न होकर अपनी सुरक्षा में गार्ड तैनात रखती हैं, लेकिन गाली-गलौज और हाथापाई का शिकार हुए डॉक्टरों के प्रति पक्षपातपूर्ण रवैया अपनाती हैं, तो यह साफ हो जाता है कि ओपीडी का दंगल तो सिर्फ एक मोहरा है, असली बिसात तो निदेशक कक्ष से ही बिछाई गई है।
