द जन सभा | निरंजन भारती
रिनपास में मरीजों से पहले डॉक्टरों का मानसिक इलाज जरूरी हो गया है ?
कहते हैं कि रांची का RINPAS मानसिक रोगियों के इलाज के लिए एशिया महादेश में मशहूर है, लेकिन शुक्रवार को यहां के ओपीडी में जो कुछ हुआ, उसने साबित कर दिया कि असली मरीजों की पहचान करने में संस्थान से थोड़ी चूक हो गई थी। ओपीडी में आए लाचार मरीज और उनके तीमारदार यह देखकर हैरान रह गए कि डॉक्टरों की स्टेथॉस्कोप वाली उंगलियां अचानक एक-दूसरे के कॉलर और गालों की तरफ बढ़ने लगीं। डॉक्टर जेके सोलंकी और डॉक्टर सिद्धार्थ सिन्हा ने अपनी मेडिकल डिग्री को किनारे रखकर, एक-दूसरे को लाइव थेरेपी, मारपीट और गाली-गलौज, देना शुरू कर दिया। आधे घंटे तक चले इस मुफ्त के मनोरंजन को मरीजों ने बिना किसी फीस के देखा, जिससे यह साफ हो गया कि संस्थान में तनाव मुक्ति का नया तरीका खोज लिया गया है।

बीच-बचाव करने वालों को प्रसाद
मनोरंजन की इस कॉकटेल में डॉक्टर सोलंकी इतने मशरूफ थे कि उन्होंने बीच-बचाव करने आए साथी डॉक्टरों को भी प्रसाद बांटने में कोई कोताही नहीं बरती। इस पूरे दंगल के दौरान, संस्थान की प्रभारी निदेशक अपने वातानुकूलित कक्ष में बिल्कुल वैसी ही तटस्थता के साथ बैठी रहीं, जैसी तटस्थता की उम्मीद अक्सर संयुक्त राष्ट्र से युद्ध के समय की जाती है। जब बाहर कॉलर खींचे जा रहे थे, तब भीतर मैडम शायद इस बात का गहन चिंतन कर रही थीं कि इस कुश्ती में रेफरी की भूमिका किसे सौंपी जाए। वैसे भी, हाल ही में डॉक्टर्स डे पर निदेशक कक्ष में एक निजी ज्वेलरी कंपनी के प्रमोशन का वीडियो वायरल होने से संस्थान की जो चमक बढ़ी थी, इस हाथापाई ने उस पर चार चांद लगा दिए हैं।
चार वैज्ञानिक करेंगे महायुद्ध की जांच, 15 दिनों में सुलझेगी गुत्थी…
चूंकि मामला डॉक्टरों के बीच का था, इसलिए इस पर पुलिसिया कार्रवाई से ज्यादा वैज्ञानिक शोध की जरूरत समझी गई। उप निदेशक प्रशासन मिथिलेश कुमार चौधरी की अध्यक्षता में आनन-फानन में एक उच्च स्तरीय बैठक बुलाई गई। अब चार डाॅक्टरों , डॉ. अमूल रंजन सिंह, डॉ. विनोद कुमार महतो, डॉ. पीपी साह और डॉ. मनीषा किरण, की एक जांच समिति बनाई गई है। इस समिति को पूरे 15 दिन का समय दिया गया है ताकि वे यह पता लगा सकें कि आखिर पहला मुक्का किसने मारा था और गाली में प्रयुक्त विशेषण व्याकरण के लिहाज से कितने सही थे।
बिना हथियार और बिना नशे के आना होगा दफ्तर
ऐतिहासिक घटना के बाद उप निदेशक की अध्यक्षता में हुई बैठक में ऐसा फरमान जारी किया गया है, जिसे मास्टरस्ट्रोक कहा जाना गलत नहीं होगा। उन्होंने दिशा-निर्देश जारी कर सख्त हिदायत दी है कि अब कोई भी अधिकारी या डॉक्टर परिसर में मादक पदार्थ, हथियार, आग्नेयास्त्र जैसे कट्टा या रिवॉल्वर या धारदार हथियार लेकर नहीं आएगा। यानी अब तक शायद डॉक्टर ओपीडी में मरीजों को देखने हथियार लेकर आ रहे थे! इसके साथ ही, इस अनुशासनहीनता का सबसे तगड़ा इलाज ढूंढते हुए प्रशासन ने शालीन ड्रेस कोड अनिवार्य कर दिया है। प्रशासन का मानना है कि यदि डॉक्टर शालीन कपड़े पहनेंगे, तो वे एक-दूसरे को ज्यादा शालीनता से गाली दे पाएंगे।
सच दिखाने पर पाबंदी, वीडियो और फोटो मीडिया को शेयर किया तो खैर नहीं…
संस्थान को इस बात का गहरा मलाल है कि डॉक्टरों की इस महान कला का वीडियो और खबरें मीडिया तक कैसे पहुंच गईं। इसलिए, नई गाइडलाइन में सबसे ज्यादा जोर इस बात पर दिया गया है कि रिनपास से जुड़ी कोई भी सूचना, दस्तावेज, वीडियो या फोटो बिना निदेशक की इजाजत के सोशल मीडिया या प्रिंट/इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर साझा नहीं होनी चाहिए। लब्बोलुआब यह है कि डॉक्टर भले ही ओपीडी में कुश्ती लड़ें, लेकिन जनता को यह लगना चाहिए कि वे योग कर रहे हैं। आखिर संस्थान की गरिमा और रोगियों की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता जो है भले ही वह सिर्फ कागजों पर ही क्यों न चमकती रहे।
