द जन सभा | निरंजन भारती
सुप्रीम कोर्ट ने बहुत सोच-समझकर रांची के मानसिक स्वास्थ्य संस्थान RINPAS को एक स्वायत्तशासी यानी आजाद बॉडी बनाया था। कोर्ट का सोचना था कि इसके पास खुद फैसले लेने की ताकत होगी, तो अस्पताल अच्छे से चलेगा। कोर्ट ने एक प्रबंध कारिणी समिति बनाई और उसे इतने पावर दे दिए कि ग्रुप ए से लेकर डी तक की सारी सरकारी नौकरियां यही कमेटी बांटेगी। लेकिन झारखंड के स्वास्थ्य मंत्रालय और बाबूशाही ने सुप्रीम कोर्ट के उस आदेश को मानो रद्दी की टोकरी में डाल दिया है। कोर्ट ने कहा था कि परमानेंट नौकरियां दो, लेकिन सरकार ने इसका मतलब शायद यह निकाल लिया कि परमानेंट बहाली छोड़ो और आउटसोर्सिंग एजेंसियों के जरिए प्राइवेट ठेकेदारों की जेबें गर्म करो! नतीजा यह हुआ कि जहाँ कभी 810 कर्मचारी होने चाहिए थे, आज वहाँ सिर्फ 132 बचे हैं। बाकी पूरा अस्पताल ठेके के कर्मचारियों के भरोसे चल रहा है, और बीच के सिंडिकेट की मोटी कमाई हो रही है।

क्या झारखंड का स्वास्थ्य विभाग खुद को भगवान समझता है?
यहाँ यह सीधा और कड़वा सवाल उठता है कि क्या झारखंड का स्वास्थ्य मंत्रालय खुद को देश की सबसे बड़ी अदालत से भी ऊपर समझता है? सुप्रीम कोर्ट ने इस बड़े अस्पताल की देखरेख की जिम्मेदारी राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को सौंपी थी ताकि मरीजों को उनका हक मिल सके। लेकिन हमारे साहबों की लाल फीताशाही के आगे सब फेल है। नियम के मुताबिक, सरकार का काम सिर्फ इस संस्थान के लिए एक नियमित डायरेक्टर ढूंढना था, बाकी सारे फैसले कमेटी को करने थे। लेकिन कमाल देखिए, जुलाई 2007 में जब आखिरी परमानेंट डायरेक्टर डॉ. पी.के. चक्रवर्ती रिटायर हुए, उसके बाद से आज तक यानी करीब 19 साल में सरकार को एक भी ढंग का डायरेक्टर नहीं मिला या सरकार खोजने में विफल रही है । हां इस उन्नीस सालों में यह जरूर हुआ है कि हर बार विज्ञापन निकलता है, नियम बदले जाते हैं, और अंत में किसी प्रभारी को कुर्सी सौंप दी जाती है। बिना सीनियरिटी की परवाह किए अपने मनपसंद अफसरों को प्रभारी बनाना यहाँ का ऐसा नियम बन चुका है, जिसने पूरे संस्थान को अंधेर नगरी में धकेल दिया है।
सुप्रीम कोर्ट के द्वारा गठित सर्वोच्च कमिटी की बैठक अगस्त 2025 से अकाल
रिनपास की मैनेजिंग कमेटी के अध्यक्ष पहले प्रमंडलीय आयुक्त हुआ करते थे, लेकिन बाद में सरकार ने इसकी कमान राज्य के विकास आयुक्त को दे दी। आज की तारीख में एक बेहद दिलचस्प संयोग बना हुआ है। राज्य के विकास आयुक्त और स्वास्थ्य सचिव, दोनों की कुर्सियों पर एक ही अफसर बैठे हैं अजय कुमार सिंह। अब आप खुद सोचिए, जो खुद ही कमेटी के बॉस हैं और खुद ही स्वास्थ्य विभाग के मालिक, उन्हें बैठक करने के लिए किसी और से इजाजत तो नहीं लेनी थी। इसके बावजूद, अगस्त 2025 के बाद से इस कमेटी की एक भी बैठक नहीं हो पाई है। जब खुद को खुद ही से मीटिंग करनी हो और फिर भी वक्त न मिले, तो सरकार की नीयत पर शक होना लाजिमी है। अफसर अपनी कुर्सी और रसूख बचाने में इतने मशगूल हैं कि अस्पताल को गर्त में जाते देखने की भी उन्हें फुर्सत नहीं है।
विदेशों में रोड शो की चमक, पर 100 साल पुराने गौरव के प्रति उदासीनता क्यों ?
सरकार आजकल दुनिया भर में बड़े-बड़े शहरों में जाकर बड़े-बड़े इवेंट्स कर रही है। विदेशी कंपनियों को बुलाया जा रहा है, बड़े-बड़े प्रोफेशनल्स को झारखंड आने का न्यौता दिया जा रहा है। लेकिन जो अपना घर का गौरव है, जिसने अभी कुछ ही समय पहले अपनी स्थापना के 100 साल पूरे किए हैं, उस ऐतिहासिक धरोहर को बचाने में सरकार पूरी तरह नाकाम और सुस्त नजर आ रही है। रिनपास और सीआईपी जैसे संस्थानों से पढ़कर निकले सैकड़ों डॉक्टर आज देश-विदेश के बड़े-बड़े अस्पतालों में ऊंचे पदों पर बैठे हैं। लेकिन जब रिनपास में डायरेक्टर बनने की बात आती है, तो यहाँ की बदहाली, स्वास्थ्य विभाग की बेजा दखलअंदाजी और नेताओं-मंत्रियों के हस्तक्षेप को देखकर कोई भी काबिल डॉक्टर यहाँ आने का रिस्क नहीं लेना चाहता। सरकार बाहर से लोगों को बुलाने का ढिंढोरा पीट रही है, और जो घर में है उसे बर्बाद होने के लिए छोड़ दिया है।
