द जन सभा | निरंजन भारती
सरकारी फाइलों और जमीनी हकीकत के बीच का फासला अक्सर प्रशासनिक गलियारों में दबा रह जाता है। लेकिन अविभाजित बिहार और वर्तमान झारखंड का एकमात्र प्रमुख मानसिक स्वास्थ्य संस्थान रांची इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूरो-साइकियाट्री एंड एलाइड साइंसेज RINPAS एक बार फिर से सुर्खियों में है। विवादों से पुराना नाता रखने वाला यह संस्थान इन दिनों जनरेटर खरीद में हुई कथित अनियमितता को लेकर चर्चा में आ गया है। इस बार विवाद की वजह एक उच्च क्षमता वाले जनरेटर की आपूर्ति से जुड़ी है। उपलब्ध दस्तावेजों के अनुसार, संस्थान की ओर से जारी कार्यादेश में मशहूर कंपनी अशोक लीलैंड के एक विशेष मॉडल का उल्लेख था। हालांकि, जब जनरेटर संस्थान परिसर में स्थापित किया गया, तो वह जैक्सन कंपनी का निकला। इस बड़े बदलाव ने प्रशासनिक प्रक्रिया और निगरानी व्यवस्था पर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

जांच और सत्यापन पर उठते सवाल
सरकारी आदेश की स्याही अभी सूखी भी नहीं थी कि कागज़ों की बाजीगरी का खेल शुरू हो गया! बीती 22 अप्रैल को कांके रोड स्थित श्री शिवम एंटरप्राइजेज को जेम पोर्टल के जरिए रिनपास परिसर में अशोक लीलैंड CS-H-A-180-CPCB मॉडल का जनरेटर लगाने का आधिकारिक कार्यादेश जारी किया गया था। इस कार्यादेश की प्रति पोर्टल पर अपलोड भी कर दी गई। लेकिन फाइलों से निकलकर रिनपास के धरातल तक पहुंचते-पहुंचते यह जनरेटर रहस्यमयी तरीके से जैक्सन कंपनी में तब्दील हो गया। अब संस्थान परिसर में जैक्सन लिमिटेड का JSP 4 180 मॉडल सीना ताने खड़ा है। कागज़ों पर दर्ज ब्रांड और मौके पर मौजूद उपकरण के बीच इस कथित हेरफेर ने पूरी खरीद प्रक्रिया की साख पर सवाल खड़े करते हुए रिनपास के पारदर्शिता के दावों की धज्जियां उड़ा दी हैं!
नियम-कानून ताक पर, कहाँ थीं निरीक्षण कमेटियां?
सरकारी नियमों की किताब साफ-साफ कहती है कि जब भी किसी दफ्तर में कोई भी सामान खरीदा या लगाया जाता है, तो उसकी एक-एक चीज की जांच होना अनिवार्य है। सामान की डिलीवरी और उसकी स्थापना के वक्त अधिकारियों और विशेषज्ञों की समितियों को खुद मौके पर जाकर भौतिक सत्यापन करना होता है। लेकिन रिनपास के इस मामले ने नियम-कानून की इस पूरी व्यवस्था को कटघरे में खड़ा कर दिया है। अब सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि जब अशोक लीलैंड की जगह जैक्सन कंपनी का जनरेटर परिसर में उतर रहा था, तब रिनपास की स्टोर कमिटी, परचेज कमिटी और तकनीकी समिति के सदस्य कहां थे? क्या निरीक्षण के दौरान किसी भी अधिकारी की नज़र इतने बड़े बदलाव पर नहीं पड़ी? या फिर सब कुछ जानते हुए भी आंखें मूंद ली गईं? आखिर किस अधिकारी की हरी झंडी पर इस दूसरे ब्रांड को परिसर में लगने दिया गया? क्या इसके लिए कोई लिखित और आधिकारिक मंजूरी ली गई थी, या फिर साठ-गांठ के खेल में नियमों को दरकिनार कर दिया गया? इन सवालों का जवाब न मिलना ही पूरी जांच प्रक्रिया पर गंभीर संदेह पैदा करता है।
18 लाख की मशीन और 60 लाख का बिल?
इस पूरे मामले का सबसे बड़ा और चौंकाने वाला पहलू वो भारी-भरकम बजट है, जो इस खरीद के नाम पर सरकारी खजाने से उड़ा दिया गया! बाजार के जानकारों और जानकारों के आंकलन पर यकीन करें, तो लगभग 180 KVA क्षमता वाले इस जनरेटर की असली कीमत करीब 18.50 लाख रुपये के आसपास बैठती है। लेकिन रिनपास के कागजों में इसी खरीद का कुल बिल लगभग 59.87 लाख रुपये का बना दिया गया! यानी बाजार भाव से सीधा तीन गुना से भी ज्यादा ! अब सवाल यह उठता है कि क्या 18 लाख की मशीन रिनपास तक पहुंचते-पहुंचते 60 लाख की कैसे हो गई? आखिर यह अतिरिक्त 41 लाख रुपये किसकी जेब में गए? हालांकि, कागजी बचाव का रास्ता खोजते हुए कुछ लोग यह तर्क दे सकते हैं कि सरकारी खरीद में सिर्फ मशीन की कीमत नहीं, बल्कि टैक्स, गाड़ी का भाड़ा, इंस्टॉलेशन, स्पेयर पार्ट्स और रखरखाव का खर्च भी जुड़ता है। लेकिन क्या ये तमाम चीजें मिलाकर भी बिल को तीन गुना से ज्यादा बढ़ा सकती हैं? यह तर्क किसी के गले नहीं उतर रहा! जब तक इस पूरी खरीद फाइल का पाई-पाई का ऑडिट नहीं होता, तब तक वित्तीय गड़बड़ी की इस बदबू को दबाया नहीं जा सकता। जनता के टैक्स के करोड़ों रुपये में से हुई इस कथित बंदरबांट का जवाब रिनपास प्रशासन को देना ही होगा!
चुनिंदा फर्मों पर मेहरबानी का बड़ा आरोप
रिनपास में सरकारी पैसों के खेल की कहानी सिर्फ एक जनरेटर के हेरफेर तक सीमित नहीं है। अगर संस्थान में पिछले कुछ वर्षों के दौरान हुई खरीदारियों की फाइलों को खंगाला जाए, तो गवर्नमेंट ई-मार्केटप्लेस यानी GeM पोर्टल के जरिए हुए टेंडरों में एक बड़े सिंडिकेट के खेल की बदबू आने लगती है। आरोप हैं कि वित्तीय वर्ष 2023-24 से लेकर अब तक रिनपास में पारदर्शी टेंडर प्रक्रिया को दरकिनार कर कुछ खास और पसंदीदा फर्मों पर ही मेहरबानियां लुटाई जा रही हैं। घूम-फिरकर अलग-अलग कामों के सरकारी वर्क ऑर्डर उन्हीं चुनिंदा ठेकेदारों की झोली में डाले जा रहे हैं। इतना ही नहीं, इस पूरे खेल में निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा की धज्जियां उड़ाने का एक और गंभीर दावा सामने आया है। कहा जा रहा है कि टेंडर में हिस्सा लेने वाली कहने को तो अलग-अलग कंपनियां होती हैं, लेकिन उनका मालिकाना हक एक ही होता है! यानी कागजों पर अलग-अलग कंपनियों का मुखौटा पहनकर एक ही सिंडिकेट आपस में ही बोली लगाता है और टेंडर हथिया लेता है। अगर इन दावों में जरा सी भी सच्चाई है, तो यह GeM पोर्टल के नियमों और निष्पक्ष टेंडर व्यवस्था का सीधा उल्लंघन है। और ऐसे में सवाल यह भी उठ रहे हैं कि आखिर रिनपास प्रशासन की शह के बिना यह सिंडिकेट राज कैसे फल-फूल रहा है?जो पूरी खरीद प्रक्रिया को कटघरे में खड़ा करता है!
गायब होते CCTV कैमरे, होटल से प्यार और ईमानदारी का इंतकाल!
खरीदारी के इस अनोखे अखाड़े में कहानी केवल जनरेटर के फेरबदल तक सीमित नहीं है, बल्कि मिस्टर इंडिया बने CCTV कैमरों और निजी होटल से किए गए शाही करार ने रिनपास के प्रशासनिक नाटक को और भी दिलचस्प बना दिया है। शताब्दी समारोह के दौरान सुरक्षा के नाम पर भारी-भरकम बजट से लगाए गए नए-नवेले कैमरे मरम्मत के नाम पर हवा में गायब हो गए और स्टॉक रजिस्टर में इनका कोई नामो-निशान न मिलने के बावजूद पुराने कैमरों की खोज-खबर लेने के बजाय नए कैमरों की खरीदारी का टेंडर तैयार किया जा रहा है। दूसरी तरफ, संस्थान के पास 8 कमरों का अपना सुसज्जित गेस्ट हाउस खाली पड़े रहने के बावजूद सरकारी खजाने के दम पर एक निजी होटल समूह के साथ समझौता कर लेने की बात सामने आ रही है , वह भी तब, जब पिछले एक साल से मैनेजमेंट कमिटी की कोई बैठक ही नहीं हुई है, जिससे यह सस्पेंस गहरा गया है कि इस निर्णय पर किस ‘अदृश्य कलम’ से दस्तखत हुए। इस पूरे मामले पर जब उप-निदेशक महेंद्र चौधरी ने यह कहकर पल्ला झाड़ लिया कि उनका काम सिर्फ प्रशासनिक देखरेख का है और वित्तीय मामलों से उनका कोई लेना-देना नहीं, तो सवाल उठता है कि आखिर इस करोड़ों की खरीदारी का असली सुल्तान’ कौन है? हालाँकि चैट डिलीट होने जैसी चर्चाओं की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन जब तक इन सारे कारनामों का निष्पक्ष ऑडिट नहीं होता, तब तक रिनपास की कार्यशैली पर कड़े सवाल उठते रहेंगे।
रिनपास से जुड़े पूर्व विवाद और डॉ. सिद्धार्थ सिन्हा का मामला
रिनपास का विवादों से नाता नया नहीं है, जनरेटर और सीसीटीवी कैमरों की संदिग्ध खरीद से पहले भी यह संस्थान लगातार प्रशासनिक अव्यवस्थाओं और अंदरूनी कलह के कारण सुर्खियों में रहा है। संस्थान की प्रभारी निदेशक डॉ. जयति सिमलई के कई प्रशासनिक फैसलों पर सवाल उठते रहे हैं, वहीं वरिष्ठ चिकित्सक डॉ. सिद्धार्थ सिन्हा द्वारा लगाए गए मानसिक और प्रशासनिक उत्पीड़न के गंभीर आरोपों ने संस्थान के अंदरूनी माहौल की कड़वी हकीकत को उजागर कर दिया था। इसके अलावा, इलाज के दौरान एक मरीज की संदिग्ध मौत का मामला हो या फिर अधिकारियों के मनमाने रवैये से जुड़ी शिकायतें, रिनपास में स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार के बजाय प्रशासनिक खींचतान और कथित प्रताड़ना के मामले ही हावी रहे हैं। इन तमाम पुराने घटनाक्रमों ने यह साफ कर दिया है कि रिनपास केवल वित्तीय अनियमितताओं का ही अड्डा नहीं बना, बल्कि प्रशासनिक स्तर पर भी जवाबदेही और निष्पक्षता पूरी तरह ध्वस्त हो चुकी है।
स्वास्थ्य विभाग और सरकार की भूमिका
रिनपास के इस खेल में स्वास्थ्य विभाग और राज्य सरकार की भूमिका किसी मुकदर्शक राजा जैसी नजर आती है, जो अपनी ही रियासत में हो रही लूट का ढोल बजने के बावजूद कुंभकर्णी नींद में सोए रहने का ढोंग कर रहा है। मुख्यमंत्री कार्यालय से लेकर भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो और स्वास्थ्य विभाग की दराजों तक कथित गड़बड़ियों की शिकायतों के ढेर जमा हैं, लेकिन साहिबों की कलम में जांच की स्याही जैसे सूख ही चुकी है। ऐसा लगता है कि 18 लाख का जनरेटर 60 लाख में बिक जाने और मरम्मत के नाम पर सीसीटीवी कैमरे हवा में उड़ जाने जैसी अद्भुत वैज्ञानिक खोजों को देखकर सरकारी तंत्र भी स्तब्ध है, तभी तो शिकायतों पर कार्रवाई करने के बजाय फाइलों को एक दराज से दूसरी दराज में टहलाने का पवित्र काम बदस्तूर जारी है। बिना किसी उच्चस्तरीय और निष्पक्ष जांच के साधना पर बैठे रहने की कला से तो यही संदेश जाता है कि रिनपास के इस अनोखे प्रशासनिक नाटक के पीछे केवल संस्थान के अधिकारी ही नहीं, बल्कि सरकार और स्वास्थ्य विभाग की मौन सह-कलाकार वाली भूमिका भी उतनी ही जिंदाबाद है!
डॉ. जयति सिमलई से जुड़े पूर्व विवाद और आरोप
रिनपास की प्रभारी निदेशक डॉ. जयति सिमलाई से जुड़े प्रमुख पूर्व विवादों में मुख्य रूप से परिसर के भीतर हुई एक सड़क दुर्घटना और संस्थान में अनियमितताओं के मामले शामिल हैं। अगस्त 2022 में रिनपास परिसर में एक मानसिक रूप से अस्वस्थ महिला मरीज की कार से कुचलकर हुई मौत के मामले में डॉ. सिमलाई के खिलाफ कांके थाने में तेजी और लापरवाही से गाड़ी चलाने के आरोप में प्राथमिकी दर्ज हुई थी, जिसके तहत अदालत में आपराधिक मुकदमे की प्रक्रिया आगे बढ़ी। इसके अलावा, संस्थान का पदभार संभालने के दौरान दवा खरीद टेंडर और भुगतान में लगभग 40 लाख रुपये की वित्तीय गड़बड़ी का मामला सामने आया था, जिसे लेकर हाईकोर्ट में हलफनामा दायर किया गया था। वहीं, संस्थान के प्रशासनिक संचालन व मरीजों के पुनर्वास को लेकर भी राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की बैठकों और सुनवाई में सवाल उठाए गए थे।
रिनपास में फॉरेंसिक ऑडिट और उच्चस्तरीय जांच की मांग
राजनीतिक पंडितों का मानना है कि रिनपास में हुई संदिग्ध खरीदारियों के सच को सामने लाने के लिए निष्पक्ष उच्चस्तरीय जांच और बहु-स्तरीय फॉरेंसिक ऑडिट अत्यंत आवश्यक है, ताकि सरकारी धन के दुरुपयोग को रोका जा सके। इस निष्पक्ष जांच के दायरे में GeM पोर्टल के माध्यम से जारी किए गए सभी कार्यादेश कंपनियों की वित्तीय और तकनीकी बोलियों की फाइलें, तथा सप्लायरों के मालिकाना हक, पते व निदेशकों की सूची से जुड़े दस्तावेज शामिल होने चाहिए। इसके साथ ही, 22 अप्रैल को जारी जनरेटर का मूल कार्यादेश, सामान की डिलीवरी के समय तैयार की गई ‘स्टोर’ व ‘तकनीकी समितियों’ की भौतिक सत्यापन रिपोर्ट तथा बिलों का विस्तृत ब्रेक-अप देखा जाना जरूरी है। इतना ही नहीं, शताब्दी समारोह के दौरान खरीदे गए सीसीटीवी कैमरों के मूल स्टॉक रजिस्टर व गायब होने की फाइलों के साथ-साथ निजी होटल समूह के साथ हुए समझौते के प्रशासनिक स्वीकृति पत्र और मैनेजमेंट कमिटी के कार्यवृत्त की गहन पड़ताल अनिवार्य है, ताकि पूरी खरीद प्रक्रिया में पारदर्शिता तय की जा सके।
दया की भीख मांगता हूँ, OPD में AC लगवा दो रिनपास के सीनियर डॉक्टर की चिठ्ठी से मची खलबली!
रिनपास, मानसिक स्वास्थ्य का बड़ा अस्पताल माना जाता है, लेकिन यहाँ का प्रशासनिक तंत्र खुद अजीबोगरीब हरकतों से जूझ रहा है। आलम यह है कि अस्पताल के एक वरिष्ठ मनोचिकित्सक को अपने ही अधिकारियों के आगे हाथ जोड़कर लिखना पड़ गया दया की भीख माँगता हूँ, बस दवा वितरण कक्ष का AC ठीक करा दीजिए। दरअसल, बीते तीन सालों से बंद पड़े इस एयर कंडीशनर की मेहरबानी से ओपीडी का छोटा सा कमरा अब सीलन और नमी का पावरहाउस बन चुका है। नतीजतन, मिर्गी और मानसिक बीमारियों की महँगी दवाइयाँ मरीजों के पेट में जाने से पहले ही लिजलिजी होकर सड़ रही हैं।

जब बरसात के मौसम में डाइवैलप्रोएट और ‘सोडियम वैलप्रोएट’ जैसी जीवनरक्षक गोलियाँ पानी-पानी होकर गलने लगती हैं, तो असली तमाशा अस्पताल के काउंटरों पर शुरू होता है। बेचारे गरीब मरीज जब सड़ी हुई दवाइयाँ लेकर लौटते हैं, तो उन्हें दिलासा देने के बजाय 20 रुपये का नया पर्चा कटाने की सलाह दी जाती है। यानी गलती व्यवस्था की, पर उसकी कीमत मरीज दोबारा रसीद कटवाकर चुकाए! पिछले 13 सालों से सेवा दे रहे डॉ. सिद्धार्थ सिन्हा का कहना है कि बदहाल दवाइयों की वजह से मरीजों का गुस्सा डॉक्टरों पर फूटता है और इससे अस्पताल की साख के साथ-साथ सरकारी खजाने को भी तगड़ी चपत लग रही है।
इतना ही नहीं, अस्पताल की दरियादिली का आलम यह है कि जो वरिष्ठ डॉक्टर दिमाग का इलाज करते हैं, उन्हें खुद टूटी मेज, पुरानी चादर और ‘ऐतिहासिक’ जमाने की बंद एसी देकर उनके धैर्य की परीक्षा ली जाती है। स्टेशनरी तक के लिए तरसते इन डॉक्टरों की लिखित शिकायतों को प्रभारी निदेशक महोदया शायद रद्दी का टुकड़ा समझकर भूल जाती हैं। अब देखना दिलचस्प होगा कि डॉक्टर साहब की इस ‘भीख’ के बाद साहबों का दिल पिघलता है या फिर दवाओं की तरह रिनपास की बची-खुची साख भी यूँ ही नमी में घुलकर बह जाएगी।
इस पूरे मामले पर रिनपास की निदेशक या किसी अधिकृत अधिकारी की ओर से अब तक कोई आधिकारिक बयान या स्पष्टीकरण जारी नहीं किया गया है। आधिकारिक पक्ष प्राप्त होते ही उसे निष्पक्षता से प्रकाशित किया जाएगा।
