चंद्रगुप्त परियोजना में किसके इशारे पर चल रहा है अवैध वसूली का खेल? तीन महीने में करोड़ों का लेनदेन?

रांची
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चंद्रगुप्त परियोजना में अवैध वसूली का आरोप? ट्रकों से 3–5 हजार रुपये लेने का दावा, तीन महीने में करोड़ों के लेनदेन ! वीडियो सामने आने के बाद जांच और कार्रवाई की मांग तेज।

द जन सभा | टंडवा | चतरा

चंद्रगुप्त कोल परियोजना में कोयला ढुलाई करने वाले ट्रकों से कथित तौर पर हजारों रुपये की वसूली का मामला सामने आने के बाद हड़कंप मच गया है? क्या परियोजना क्षेत्र में ट्रकों को रोककर पैसे लेने का कोई संगठित खेल चल रहा है? क्या प्रति ट्रक 3 हजार से 5 हजार रुपये तक की रकम वसूली जा रही है? और अगर ऐसा हो रहा था तो आखिर किसके इशारे पर? सोशल मीडिया पर वायरल एक वीडियो ने इन सवालों को और गहरा बना दिया है। वीडियो में वाहनों से पैसे लिए जाने की बात कही जा रही है, हालांकि इसकी पुष्टि अभी नहीं हुई है कि पैसे क्यों ली जा रही थी। चंद्रगुप्त परियोजना के एक रैयत ने आरोप लगाया है कि जून महीने से ही वसूली का सिलसिला चल रही है। ऐसे में सवाल यह है कि अगर इतने लंबे समय से ट्रकों से पैसा लिया जा रहा था तो परियोजना की निगरानी करने वाले जिम्मेदार अधिकारियों को इसकी भनक कैसे नहीं लगी? क्या वाहन चालकों ने इसकी शिकायत नहीं की? अगर शिकायत हुई तो कार्रवाई क्यों नहीं हुई? और अगर शिकायत नहीं हुई तो क्या ट्रक मालिक और चालक किसी दबाव में थे? सूत्रों का दावा है कि बड़ी संख्या में ट्रकों से कथित तौर पर 3 हजार से 5 हजार रुपये तक की रकम ली गई। अब इस दावे की सच्चाई जानने का सबसे सीधा रास्ता क्या है? पिछले तीन महीनों का वाहन रिकॉर्ड निकाल लिया जाए, रोज कितने ट्रक परियोजना में आए और कितने बाहर निकले, इसका हिसाब लगाया जाए और फिर भुगतान से उसका मिलान किया जाए? अगर किसी वाहन से निर्धारित लोडिंग या परिवहन शुल्क के अलावा पैसा लिया गया है तो उसकी रसीद कहां है? पैसा किसके पास गया? किस खाते में गया? किस मोबाइल नंबर पर यूपीआई भुगतान हुआ? और अगर नकद लिया गया तो उसका हिसाब किस रजिस्टर में दर्ज है? इसका जवाब अनुमान से नहीं बल्कि तीन महीने के वाहन रिकॉर्ड, बैंक खातों, यूपीआई लेनदेन और वाहन मालिकों के बयान से ही मिलेगा। सवाल यह भी है कि अगर जांच एजेंसियां वास्तव में इस मामले की तह तक जाती हैं तो क्या सिर्फ एक-दो लोगों की पहचान होगी या फिर पूरी कथित वसूली व्यवस्था की परतें खुलेंगी?

कमेटी के नाम पर आखिर क्या चल रहा था?

मामले का एक और अहम पहलू कथित कमेटियों को लेकर है। स्थानीय रैयतों की ओर से आरोप लगाया गया है कि कुछ तथाकथित कमेटियों की आड़ में लंबे समय से वाहनों से रकम वसूली जा रही थी। लेकिन यहां सबसे बड़ा सवाल क्या है? आखिर इन कमेटियों को बनाया किसने? इनका काम क्या था? क्या इन्हें परियोजना क्षेत्र में वाहनों को रोकने का अधिकार था? क्या इन्हें लोडिंग से जुड़ा कोई शुल्क लेने की अनुमति थी? अगर थी तो वह अनुमति लिखित रूप में कहां है? और अगर अनुमति नहीं थी तो परियोजना क्षेत्र में ट्रकों से कथित तौर पर पैसा लेने वालों को रोकने की जिम्मेदारी किसकी थी? शिकायतकर्ता पक्ष जिस कमेटी का जिक्र कर रहा है, उसकी वैधता और अधिकारों की जांच अब इस पूरे मामले की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी बन सकती है। क्योंकि अगर किसी समिति को केवल विस्थापित रैयतों से जुड़े समन्वय या व्यवस्था का काम दिया गया था, तो क्या उसके नाम पर ट्रकों से रकम लेने की अनुमति भी थी? और अगर कोई अनुमति नहीं थी तो फिर पैसा किस अधिकार से लिया जा रहा था?

समिति को अनुमति थी तो सीमा क्या थी?

मामले में एक पत्र को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। शिकायतकर्ता पक्ष के अनुसार आम्रपाली-चंद्रगुप्त क्षेत्र के जीएम संजीव कुमार की ओर से जारी बताए जा रहे पत्र में भू-रैयत विस्थापित-प्रभावित समिति, चंद्रगुप्त परियोजना का उल्लेख है और परियोजना के सुचारू संचालन के लिए समिति को स्वीकृति दिए जाने की बात कही गई है। अब सवाल यह है कि इस स्वीकृति का मतलब क्या था? समिति को वास्तव में कौन-कौन से अधिकार दिए गए थे? क्या उस स्वीकृति में कहीं वाहनों से पैसे लेने की अनुमति थी? अगर नहीं थी तो फिर कथित वसूली किस आधार पर हुई? और अगर कोई वित्तीय अधिकार दिया गया था तो उसकी सीमा क्या थी? कितना पैसा लिया जा सकता था और उसका हिसाब कहां रखा जाना था? क्या सीसीएल प्रबंधन ने कभी समिति के काम और वित्तीय लेनदेन की समीक्षा की? इन सवालों का जवाब सामने आना इसलिए जरूरी है क्योंकि मामला सिर्फ एक वीडियो का नहीं रह गया है, बल्कि अब परियोजना के भीतर मौजूद व्यवस्था और उसके इस्तेमाल को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं।

क्या जांच में सामने आएगा सच?

अपुष्ट सूत्रों के अनुसार एक रैयत मे आम्रपाली जीएम संजीव कुमार, सुशी इंफ्रा कंपनी के जीएम आर.एस. यादव और पीओ भूषण पर मिलीभगत और संरक्षण देने के आरोप लगाए हैं। अधिकारियों के खिलाफ लगाए गए आरोपों की पुष्टि नहीं हुई है, इसलिए उनकी भूमिका पर अंतिम निष्कर्ष जांच के बाद ही निकाला जा सकता है। लेकिन शिकायत में नाम आने के बाद यह जरूर बड़ा सवाल बन गया है कि परियोजना प्रबंधन की निगरानी व्यवस्था कितनी प्रभावी थी? अगर कथित वसूली वास्तव में परियोजना क्षेत्र में होती रही तो जिम्मेदार निगरानी तंत्र को इसकी जानकारी क्यों नहीं हुई? और अगर जानकारी हुई तो कार्रवाई क्यों नहीं हुई?

डिजिटल रिकॉर्ड से खुल सकता है पूरा राज?

मामले में फोन-पे और डिजिटल भुगतान का आरोप सामने आना जांच के लिए बेहद अहम हो सकता है। शिकायतकर्ता पक्ष का दावा है कि कथित तौर पर निर्धारित लोडिंग शुल्क से अधिक रकम डिजिटल माध्यम से भी ली गई। अगर ऐसा हुआ है तो फिर सवाल बहुत सीधा है? पैसा किस मोबाइल नंबर पर गया? नंबर किसके नाम पर है? किस बैंक खाते से जुड़ा है? कितने वाहनों से भुगतान आया? भुगतान की तारीख और समय क्या था? क्या उसी समय संबंधित वाहन परियोजना में मौजूद था? अगर वाहन रिकॉर्ड और यूपीआई रिकॉर्ड का मिलान किया जाए तो क्या कथित वसूली की तस्वीर साफ हो सकती है? यही वह बिंदु है जहां जांच आगे बढ़ती है तो कहानी केवल आरोपों तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि दस्तावेजी सबूत सामने आ सकते हैं। यदि डिजिटल भुगतान हुआ है तो उसकी ट्रांजैक्शन हिस्ट्री, बैंक स्टेटमेंट और वाहन रिकॉर्ड का मिलान जांच का अहम हिस्सा होना चाहिए। आखिर अगर पैसा लिया गया था तो वह गया कहां?

वीडियो सामने आया तो कार्रवाई कहां है?

इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल कथित वीडियो को लेकर है। अगर सोशल मीडिया पर ऐसा वीडियो मौजूद है जिसमें परियोजना क्षेत्र में वाहनों से रकम लेने की गतिविधि दिखाई देती है तो उसकी तकनीकी जांच क्यों नहीं होनी चाहिए? वीडियो कब बनाया गया? कहां बनाया गया? उसमें दिखाई देने वाले लोग कौन हैं? वहां खड़े वाहनों के नंबर क्या हैं? क्या उन वाहनों के चालक और मालिक मिल सकते हैं? क्या उन्होंने किसी तरह की रकम दिए जाने की बात कही? क्या उसी समय का सीसीटीवी फुटेज उपलब्ध है? क्या परियोजना के गेट पर वाहन प्रवेश और निकास का रिकॉर्ड मौजूद है? अगर इन सभी सवालों की जांच हो तो कथित वसूली की सच्चाई काफी हद तक सामने आ सकती है। लेकिन सवाल यह भी है कि क्या इस वीडियो को केवल सोशल मीडिया की सामग्री मानकर छोड़ दिया जाएगा या पुलिस और प्रशासन इसे संभावित साक्ष्य के तौर पर जांच में शामिल करेंगे?

तीन महीने का हिसाब खुलेगा तो क्या निकलेगा?

रैयत पक्ष तीन महीने के वाहन आवागमन और कथित वित्तीय लेनदेन की जांच की मांग कर रहा है। अब अगर वास्तव में जांच होती है तो क्या सिर्फ एक दिन या दो दिन का रिकॉर्ड देखा जाएगा? या 22 जून से अब तक का पूरा डेटा खंगाला जाएगा? कितने ट्रक आए? कितनी बार आए? किस कंपनी के वाहन थे? किस चालक ने क्या बयान दिया? किस वाहन से कितना पैसा लिया गया? क्या किसी वाहन चालक ने डिजिटल भुगतान किया? क्या एक ही नंबर पर बार-बार पैसा पहुंचा? क्या किसी एक खाते में बड़ी संख्या में छोटे-छोटे भुगतान आए? और अगर ऐसा हुआ तो उस खाते का मालिक कौन है? यही वे सवाल हैं जिनका जवाब कथित वसूली के पूरे नेटवर्क की तस्वीर सामने ला सकता है। करोड़ों रुपये की वसूली का दावा फिलहाल आरोप है, लेकिन अगर जांच में बड़ी संख्या में भुगतान के दस्तावेज मिलते हैं तो मामला बेहद गंभीर रूप ले सकता है।

किस-किस तक पहुंचेगी जांच की आंच?

चंद्रगुप्त परियोजना में सामने आए कथित वसूली के आरोप अब सिर्फ स्थानीय विवाद का विषय नहीं रह गए हैं। सवाल परियोजना की सुरक्षा, वाहन संचालन, कमेटियों की भूमिका, कथित डिजिटल भुगतान और अधिकारियों की निगरानी व्यवस्था तक पहुंच गया है। अब क्या हजारीबाग पुलिस पूरे मामले की जांच करेगी? क्या जिला प्रशासन रिकॉर्ड तलब करेगा? क्या सीसीएल प्रबंधन अपनी आंतरिक जांच कराएगा? क्या खनन विभाग संबंधित शुल्क और परिवहन व्यवस्था की जांच करेगा? क्या कथित वीडियो की तकनीकी जांच होगी? क्या पिछले तीन महीनों के सीसीटीवी, वाहन रिकॉर्ड और डिजिटल लेनदेन को खंगाला जाएगा? और सबसे बड़ा सवाल अगर वसूली का आरोप सही साबित हुआ तो पैसा किसके पास पहुंचा और इस पूरी व्यवस्था के पीछे कौन-कौन लोग थे? फिलहाल चंद्रगुप्त कोल परियोजना में कथित वसूली का मामला सवालों के घेरे में है। आरोप सही हैं या नहीं, इसका फैसला जांच और साक्ष्यों से ही होगा।

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