Delimitation News: परिसीमन के खिलाफ रांची में आदिवासियों ने कर दिया उलगुलान का ऐलान…

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द जन सभा |  निरंजन भारती

सीटें घटाने की साज़िश का आरोप

रांची में विभिन्न आदिवासी संगठनों और सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ताओं ने एक संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस कर परिसीमन के नाम पर अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित सीटों में संभावित कटौती की आशंका जताई है। आदिवासी नेताओं ने चेतावनी दी है कि आदिवासियों के राजनीतिक अधिकारों को कम करने की किसी भी साज़िश का पुरज़ोर विरोध किया जाएगा। उन्होंने दो टूक कहा कि जब तक पिछले 75 सालों में आदिवासियों के साथ हुए ऐतिहासिक अन्यायों का हिसाब नहीं हो जाता, तब तक परिसीमन की कोई भी प्रक्रिया शुरू नहीं होनी चाहिए।

कागज़ी बाघ बने संवैधानिक अधिकार

आदिवासी प्रतिनिधियों ने आरोप लगाया कि संविधान की पांचवीं अनुसूची के तहत राज्यपाल को अनुसूचित क्षेत्रों में आदिवासियों के हितों की रक्षा, भूमि हस्तांतरण पर रोक और गैर-आदिवासियों के प्रवेश को नियंत्रित करने की विशेष शक्तियां दी गई हैं, लेकिन दशकों से इन प्रावधानों को महज़ ‘कागज़ी बाघ’ बनाकर रख दिया गया है। प्रवक्ताओं के अनुसार, छोटानागपुर टेनेंसी एक्ट और संथाल परगना टेनेंसी एक्ट (SPT) का खुलेआम उल्लंघन कर, फर्जी दस्तावेज़ों और राजस्व-पुलिस प्रशासन की मिलीभगत से आदिवासियों की लाखों एकड़ ज़मीन हड़प ली गई है।

विस्थापन और जनसांख्यिकीय बदलाव का दर्द

प्रेस वार्ता के दौरान देश में आदिवासियों के बड़े पैमाने पर हुए विस्थापन के आंकड़े भी सामने रखे गए। नेताओं ने कहा कि 1951 से 1960 के बीच विभिन्न विकास परियोजनाओं के नाम पर करीब 85 लाख आदिवासी विस्थापित हुए, जो कुल विस्थापितों का 40 से 60 प्रतिशत है; जबकि देश की आबादी में आदिवासियों का हिस्सा महज़ 8.6 फीसदी है। उन्होंने कहा कि पेसा कानून 1996 और वन अधिकार अधिनियम 2006 जैसे प्रगतिशील कानूनों को दरकिनार कर ग्राम सभाओं की सहमति की लगातार अनदेखी की गई है, जिससे आदिवासी क्षेत्रों में भारी जनसांख्यिकीय बदलाव आया है।

परिसीमन को दूसरा बड़ा विश्वासघात करार दिया

आदिवासी कार्यकर्ताओं का कहना है कि बाहरी आबादी के अनियंत्रित रूप से बसने और ज़मीन की लूट के कारण ही आदिवासी क्षेत्रों में उनकी आबादी का अनुपात कम हुआ है। ऐसे में जनसंख्या परिवर्तन का हवाला देकर आरक्षित सीटों को घटाना आदिवासियों के साथ दूसरा सबसे बड़ा विश्वासघात होगा। उन्होंने मांग की है कि सीटों में कटौती करने के बजाय पांचवीं अनुसूची के क्षेत्रों में सीटों की संख्या बढ़ाई जाए और आदिवासी सीटों को ‘फ्रीज’ किया जाए। इसके अलावा, उन्होंने पिछले 75 वर्षों में हुई ज़मीन की लूट और विस्थापन की जांच के लिए एक संसदीय समिति और न्यायिक आयोग के गठन की भी मांग की है।

30 अगस्त को रांची में महारैली का एलान

अपनी इन मांगों को लेकर आदिवासी संगठनों ने आगामी 30 अगस्त 2026  को रांची के ऐतिहासिक मोरहाबादी मैदान में दोपहर 12 बजे एक ‘आदिवासी एकता महाजुटान महारैली’ का आह्वान किया है। आदिवासी नेताओं का कहना है कि यह रैली केवल राजनीतिक सीटें बचाने की नहीं, बल्कि आदिवासियों की ज़मीन, संस्कृति, पहचान और उनके संवैधानिक अस्तित्व को बचाने की लड़ाई का एक नया अध्याय होगी। संवाददाता सम्मेलन को मुख्य रूप से प्रवक्ता लक्ष्मीनारायण मुंडा, प्रवक्ता अजय तिर्की, शशि पन्ना, रमा खलखो और ग्लैडसन डुंगडुंग ने संबोधित किया और सभी राजनीतिक दलों से इस संवेदनशील मुद्दे पर अपना रुख स्पष्ट करने की मांग की।

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