RINPAS NEWS: रिनपास की बदहाली: जब लालफीताशाही ने छीन ली देश के प्रतिष्ठित मानसिक स्वास्थ्य संस्थान की स्वायत्तता!

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द जन सभा | निरंजन भारती

राजधानी रांची के कांके में स्थित राज्य का इकलौता मानसिक स्वास्थ्य संस्थान रांची तंत्रिका मनोचिकित्सा शिक्षा एवं संबद्ध विज्ञान संस्थान आज प्रशासनिक उदासीनता और सरकारी उपेक्षा के कारण दम तोड़ रहा है। जिस संस्थान को कभी मानसिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में एक आदर्श के रूप में विकसित होना था, वह आज खुद ही बदहाली का शिकार हो चुका है। साल 1994 में सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक आदेश के तहत रिनपास को स्वायत्तशासी संस्थान का दर्जा दिया था ताकि इसे सरकारी लालफीताशाही और प्रशासनिक लेटलतीफी से दूर रखकर एक उत्कृष्ट केंद्र बनाया जा सके। कोर्ट ने प्रबंधन की जिम्मेदारी एक प्रबंधकारिणी समिति और निदेशक को सौंपी थी, जिन्हें खुद की नियमावली बनाने और नियुक्तियाँ करने के पूर्ण अधिकार थे।

साल 2007 तक इस स्वायत्तता का सही इस्तेमाल हुआ, नए विभाग खुले और प्रशिक्षण कार्यक्रम भी शुरू हुए। लेकिन आज स्थिति बिल्कुल उलट है; स्वास्थ्य विभाग के कथित हस्तक्षेप और लालफीताशाही ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा दी गई इस स्वायत्तता को कागजों तक समेट दिया है।

नियुक्तियों पर 20 साल से ‘ग्रहण’…

रिनपास की इस बदहाली की सबसे बड़ी और कड़वी हकीकत यह है कि यहाँ पिछले 20 वर्षों से स्थायी पदों पर कोई नई बहाली नहीं की गई है। संस्थान में कुल 810 स्थायी पद स्वीकृत हैं, लेकिन वर्तमान में महज 132 स्थायी कर्मचारी ही कार्यरत हैं। विडंबना देखिए कि दो दशकों से सरकार यहाँ एक अदद स्थायी निदेशक तक की नियुक्ति नहीं कर पाई है। इस भारी कमी का सीधा असर यहाँ की चिकित्सा और शिक्षा व्यवस्था पर पड़ा है। साल 2019 से ही साइकियाट्री विभाग में एमडी की पढ़ाई पूरी तरह बंद है। हालाँकि, कुछ समय पहले डीएनबी की पढ़ाई शुरू जरूर कराई गई थी, लेकिन इसकी सीटें भी नहीं बढ़ाई जा सकीं।

साइकियाट्री नर्सिंग विभाग तालेबंदी की कगार पर है और मनोसामाजिक कार्य विभाग का पूरा दारोमदार केवल एक अकेली प्राध्यापक के कंधों पर टिका हुआ है। लगभग 500 मरीजों की क्षमता वाले इस बड़े अस्पताल में केवल 8 मनोचिकित्सक बचे हैं, जिनमे से कई ऐसे मनोचिकित्सक है जो प्रतिनियुक्ति के आधार पर पदस्थापित है। महिला और पुरुष वार्डों में मरीजों की देखभाल के लिए न तो स्थायी नर्सें हैं, न वार्ड अटेंडेंट और न ही सफाईकर्मी।

कमीशन का खेल’ और आधारभूत संरचना के नाम पर बंदरबांट का आरोप

आरोप है कि साल 2007 के बाद से संस्थान में कोई स्थायी निदेशक न होने का स्वास्थ्य विभाग ने भरपूर फायदा उठाया। प्रभारी निदेशकों पर आरोप लगते रहे हैं कि वे विभाग के सामने नतमस्तक होकर महज एक रबर स्टाम्प बनकर रह गए। इसके बाद रिनपास का पूरा ध्यान मरीजों के इलाज और शैक्षणिक विकास से हटकर केवल भारी-भरकम निर्माण कार्यों और सामानों की खरीद-फरोख्त पर केंद्रित हो गया। नियमों को ताक पर रखकर जेम पोर्टल पर टेंडर अधिकारियों द्वारा कथित तौर पर अपने घरों से अपलोड किए जाने के गंभीर मामले सामने आए हैं। अधिकारियों और चहेते कर्मचारियों के एक छोटे से सिंडिकेट पर वित्तीय अनियमितताओं और कमीशनखोरी के जरिए मोटी कमाई करने के आरोप लग रहे हैं। यहाँ तक कि सरकारी गाइडलाइंस को दरकिनार करते हुए, प्रतिनियुक्ति पर आए कुछ पसंदीदा कर्मचारी पिछले तीन साल से भी अधिक समय से संवेदनशील वित्त, लेखा और खरीद विभागों पर कब्जा जमाए बैठे हैं, जिससे एक बड़े वित्तीय घोटाले की आशंका को नकारा नहीं जा सकता।

मरीजों की सुरक्षा भगवान भरोसे

अस्पताल के भीतर की व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने के बजाय स्वास्थ्य विभाग और रिनपास के अधिकारियों का झुकाव कुछ खास निजी आउटसोर्सिंग एजेंसियों की तरफ ज्यादा दिखाई दे रहा है। मैनपावर, सुरक्षा और हाउसकीपिंग के नाम पर इन चुनिंदा एजेंसियों को बढ़े हुए सर्विस चार्ज पर ठेके देकर उपकृत किया जा रहा है। सूत्रों और शिकायतों के मुताबिक, इन एजेंसियों के जरिए मनमाने ढंग से कर्मियों की संख्या बढ़ाकर उनसे मोटी रकम वसूली जाती है, जबकि जमीनी स्तर पर काम करने वाले इन संविदा कर्मचारियों को बेहद कम वेतन, पीएफ और बोनस दिया जाता है।

इस शोषण के खिलाफ आने वाली शिकायतें विभागीय फाइलों में धूल फांक रही हैं। नतीजा यह है कि वर्तमान में पूरा रिनपास अप्रशिक्षित निजी सुरक्षाकर्मियों और संविदा सफाईकर्मियों के भरोसे चल रहा है। अस्पताल की चारदीवारी के भीतर गंभीर मानसिक रोगों से जूझ रहे मरीजों की देखभाल भगवान भरोसे है, और स्वास्थ्य विभाग के जिम्मेदार अधिकारी और मंत्री ऑल इज वेल राग अलापने में मशरूफ हैं।

रिनपास की कुव्यवस्था को लेकर सत्ताधारी दल के लोग भी उठाते रहे हैं आवाज

कांके झामुमो प्रखंड अध्यक्ष नवीन तिर्की और सोनू मुंडा सहित अन्य स्थानीय नेताओं ने बताया कि वे इस बदहाली के खिलाफ लगातार आवाज उठाते रहे हैं। सिर्फ मौखिक रूप से ही नहीं, बल्कि रिनपास की इस जर्जर स्थिति और वित्तीय गड़बड़ी की आशंकाओं को लेकर अधिकारियों को बकायदा लिखित शिकायत भी दी गई है। इसके बावजूद अब तक इस दिशा में कोई कार्रवाई नहीं होना बेहद चिंताजनक है। नेताओं ने स्पष्ट किया कि लिखित साक्ष्य और शिकायतें सौंपे जाने के बाद भी स्वास्थ्य विभाग का इस तरह मौन साधे रहना और लगातार अनदेखी करना अधिकारियों की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े करता है।

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