मगध-अम्रपाली में कौन करवा रहा है कोयले की चोरी? सीआईएसएफ की कार्रवाई से मचा हड़कंप

रांची
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द जन सभा/ टंडवा – चतरा

सीसीएल के मगध-अम्रपाली क्षेत्र में अवैध कोयला खनन और चोरी के खिलाफ CISF की कार्रवाई के बाद एक बार फिर पूरे इलाके में कई गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। फुलवरिया साइडिंग के पीछे करीब 200 टन अवैध रूप से जमा कोयला बरामद होने की सूचना ने यह सवाल सामने ला दिया है कि आखिर इतनी बड़ी मात्रा में कोयला वहां पहुंचा कैसे और इसे जमा करने वालों को किसका संरक्षण या सहारा मिल रहा था? सीआईएसएफ यूनिट एनके एवं पिपरवार की संयुक्त टीम ने निरीक्षण और निगरानी के दौरान इस कार्रवाई को अंजाम दिया । कार्रवाई कमांडेंट अमित कुमार के निर्देश पर और उप कमांडेंट अजय कुमार पांडेय के नेतृत्व में की गई। लेकिन सवाल यह है कि कोयला वहां तक पहुंचा कैसे और पहुंचाने वाला कौन था, इसे जमा करने वाला कौन था और इसे आगे कहां भेजा जाना था? राजनीतिक पंडित बताते हैं कि 200 टन कोयला किसी छोटे-मोटे लेनदेन का हिस्सा नहीं माना जा सकता। इतनी बड़ी मात्रा में कोयले को निकालने, एक जगह जमा करने और फिर उसे आगे खपाने के लिए किसी न किसी स्तर पर पूरी व्यवस्था की जरूरत होती है। ऐसे में जांच सिर्फ इस बात तक सीमित नहीं रहनी चाहिए कि मौके से कोयला बरामद हो गया। जांच का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा यह होना चाहिए कि इस कोयले का स्रोत क्या था? क्या इसे किसी अवैध खनन स्थल से निकाला गया था? क्या यह सीसीएल की परियोजना से चोरी किया गया था? इसे कितने समय से वहां जमा किया जा रहा था? इससे पहले वहां से कितनी बार कोयला उठाया गया? इसे किन वाहनों के जरिए लाया और ले जाया गया? और सबसे बड़ा सवाल इस पूरे कारोबार से आर्थिक फायदा किसे हो रहा था?

कार्रवाई के बाद मगध-अम्रपाली क्षेत्र की निगरानी व्यवस्था पर भी सवाल उठना स्वाभाविक है। जिस इलाके में कोयले का उत्पादन और परिवहन बड़े पैमाने पर होता है, वहां अलग-अलग स्तर पर सुरक्षा और निगरानी की व्यवस्था रहती है। ऐसे में अगर किसी स्थान पर धीरे-धीरे करके करीब 200 टन कोयला जमा हो गया और इसकी जानकारी समय रहते संबंधित तंत्र तक नहीं पहुंची, तो यह गंभीर सवाल है कि निगरानी में चूक कहां हुई? क्या परियोजना क्षेत्र का नियमित निरीक्षण होता है? क्या संदिग्ध स्थानों की लगातार निगरानी की जाती है? क्या कोयले के स्टॉक और आवाजाही की नियमित जांच होती है? अगर होती है तो इतनी बड़ी मात्रा में कोयला जमा होने की जानकारी पहले क्यों नहीं मिली? और अगर नहीं होती, तो आखिर जिम्मेदारी किसकी है? सवाल प्रोजेक्ट अधिकारी, महाप्रबंधक और परियोजना से जुड़े दूसरे जिम्मेदार अधिकारियों की निगरानी व्यवस्था को लेकर भी उठना तय है। अगर परियोजना क्षेत्र में अवैध कोयला जमा हो रहा था तो संबंधित अधिकारियों को इसकी जानकारी क्यों नहीं थी ? अगर कोई सूचना नहीं मिली थी तो फिर सीआईएसएफ की टीम वहां तक कैसे पहुंच गई? सवाल स्थानीय प्रशासन और पुलिस की भूमिका पर भी उठता है। यदि चोरी का कोयला परियोजना क्षेत्र से निकलकर दूसरे स्थानों तक पहुंच रहा है, तो उसके लिए परिवहन का रास्ता भी होगा। वाहन आएंगे-जाएंगे, रास्तों से गुजरेंगे और कई जगहों से होकर निकलेंगे। ऐसे में सवाल यह है कि क्या पुलिस और प्रशासन को कोयले की इस संदिग्ध आवाजाही की कोई जानकारी नहीं थी? अगर जानकारी नहीं थी तो क्यों नहीं थी? क्या संवेदनशील इलाकों में नियमित वाहन जांच होती है? क्या संदिग्ध कोयला लदे वाहनों के कागजात और कोयले के स्रोत की जांच की जाती है? अगर होती है तो चोरी का कोयला बाहर कैसे निकल रहा है? और अगर जांच नहीं होती तो इसके पीछे कारण क्या है? ये सवाल किसी एक विभाग को कटघरे में खड़ा करने के लिए नहीं, बल्कि उस पूरी व्यवस्था से जवाब मांगने के लिए हैं जिसके जिम्मे अवैध गतिविधियों पर रोक लगाना है।

स्थानीय स्तर पर यह भी सवाल उठता रहा है कि कोयला परिवहन से जुड़े वाहन अलग-अलग थाना क्षेत्रों से होकर गुजरते हैं। ऐसे में अगर अवैध कोयला कारोबार बड़े पैमाने पर चल रहा है तो उसकी आवाजाही को पूरी तरह छिपाना आसान नहीं होना चाहिए। आखिर वाहन कहां से निकलते हैं, किस रास्ते से जाते हैं और कहां पहुंचते हैं? क्या रास्ते में कहीं उनकी जांच होती है? क्या वाहनों के दस्तावेज और लोड की जांच की जाती है? अगर किसी वाहन में अवैध कोयला पकड़ा जाता है तो केवल चालक और वाहन तक कार्रवाई सीमित क्यों रहे? असल जांच तो वहां से शुरू होनी चाहिए कि उस वाहन में कोयला आया कहां से और उसे पहुंचाना कहां था। अगर इस पूरी कड़ी की जांच हो तो संभव है कि चोरी के पीछे काम करने वाले लोगों और नेटवर्क की वास्तविक तस्वीर सामने आ सके।

सबसे गंभीर सवाल यह है कि क्या फुलवरिया साइडिंग के पीछे मिला 200 टन कोयला सिर्फ एक स्थान पर हुई एक घटना है या इसके पीछे कोई बड़ा नेटवर्क काम कर रहा है? क्या परियोजना क्षेत्र के आसपास ऐसे और भी स्थान हैं जहां चोरी का कोयला जमा किया जाता है? क्या पुराने संदिग्ध ठिकानों की जांच होगी? क्या पिछले कुछ महीनों में कोयला चोरी की घटनाओं और बरामदगी का रिकॉर्ड खंगाला जाएगा? क्या यह पता लगाया जाएगा कि किन रास्तों से अवैध कोयला बाहर जाता है और किन लोगों तक पहुंचता है? जब तक इन सवालों की तह तक नहीं पहुंचा जाता, तब तक सिर्फ मौके से कोयला बरामद कर लेना पूरी कहानी का अंत नहीं माना जा सकता।

एक और महत्वपूर्ण सवाल यह है कि अगर कोयला लगातार चोरी हो रहा था तो उस चोरी का हिसाब आखिर कहां दिखाई देता है? उत्पादन कितना हुआ, स्टॉक कितना रहा, परिवहन के लिए कितना कोयला निकला और वास्तविक रूप से कितना कोयला अपने निर्धारित स्थान तक पहुंचा इन आंकड़ों का मिलान कितना नियमित रूप से होता है? कहीं ऐसा तो नहीं कि कागज पर सब कुछ सामान्य दिखाई दे रहा हो और जमीन पर कहानी कुछ और हो? यह जांच का विषय है और इसका जवाब दस्तावेजों, स्टॉक रिकॉर्ड, परिवहन रिकॉर्ड, सीसीटीवी फुटेज, वाहन विवरण और संबंधित लोगों से पूछताछ के जरिए सामने आ सकता है।

सीआईएसएफ की इस कार्रवाई ने कम से कम इतना जरूर साफ कर दिया है कि अवैध कोयला कारोबार के खिलाफ कार्रवाई की गुंजाइश और जरूरत दोनों मौजूद हैं। अब देखना यह है कि जांच एजेंसियां इस मामले को केवल 200 टन कोयला बरामद होने की कार्रवाई तक सीमित रखती हैं या फिर उस पूरी कड़ी तक पहुंचती हैं जहां से यह कोयला निकला, जहां जमा हुआ और जहां भेजा जाना था। अगर जांच निष्पक्ष और गहराई से होती है तो सिर्फ कोयला रखने वाले व्यक्ति तक मामला सीमित नहीं रहेगा, बल्कि उसके पीछे मौजूद नेटवर्क, परिवहन व्यवस्था और संभावित खरीदारों तक भी पहुंच बनाई जा सकती है।

फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है मगध-अम्रपाली में आखिर कौन करवा रहा है कोयले की चोरी? क्या यह कुछ लोगों की स्थानीय गतिविधि है, क्या इसके पीछे संगठित नेटवर्क है या कहीं निगरानी व्यवस्था की कमजोरी का फायदा उठाया जा रहा है? इन सवालों के जवाब जांच के बाद ही सामने आएंगे। लेकिन करीब 200 टन कोयला बरामद होने के बाद यह सवाल जरूर उठेगा कि अगर इतनी बड़ी मात्रा में कोयला एक जगह जमा किया जा सकता है, तो क्या इससे पहले भी इसी तरह कोयले की आवाजाही होती रही है और किसी को इसकी खबर नहीं लगी? और अगर खबर लगी थी, तो कार्रवाई क्यों नहीं हुई? यही वह सवाल है जिसका जवाब अब मगध-अम्रपाली क्षेत्र के लोगों को भी चाहिए और संबंधित जिम्मेदार तंत्र को भी देना चाहिए।

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