द जन सभा | निरंजन भारती
झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने केंद्र सरकार की नीतियों और नीयत के खिलाफ अब तक का सबसे तीखा और आक्रामक रुख अख्तियार कर लिया है। संसद के दोनों सदनों से पारित खान एवं खनिज संशोधन विधेयक, 2026′ को झारखंडियों की अस्मिता और अधिकारों पर सीधा हमला बताते हुए सोरेन ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु को एक बेहद तल्ख और भावुक चिट्ठी लिखी है। सोरेन ने दो टूक शब्दों में कहा है कि यह मामला सिर्फ राज्य के राजस्व या कुछ हजार करोड़ रुपये के घाटे का नहीं है, बल्कि यह सवाल झारखंड की माटी, जल-जंगल-जमीन की स्वायत्तता और सदियों से जारी झारखंडियों के संघर्ष का है। केंद्र सरकार धारा 9D जोड़कर राज्यों के विधायी अधिकारों पर बुलडोजर चला रही है और खनिज बहुल राज्यों को आर्थिक रूप से पंगु बनाने की सोची-समझी साजिश रच रही है।

सर्वोच्च न्यायालय के फैसले की अवहेलना और कॉरपोरेट परस्त नीतियां
पत्र में मुख्यमंत्री ने राष्ट्रपति को याद दिलाया कि देश की सर्वोच्च अदालत की नौ न्यायाधीशों की संविधान पीठ (Mineral Area Development Authority बनाम Steel Authority of India Ltd.) ने राज्यों के हक में ऐतिहासिक फैसला सुनाया था। कोर्ट ने मुहर लगाई थी कि सातवीं अनुसूची के तहत राज्यों को अपनी खनिज भूमि पर टैक्स या उपकर लगाने का पूरा अधिकार है। लेकिन केंद्र सरकार को यह गवारा नहीं हुआ। सोरेन का आरोप है कि संसद में नया संशोधन लाकर केंद्र सरकार न केवल सुप्रीम कोर्ट की अवहेलना कर रही है, बल्कि कानून बदलकर उद्योगपतियों और कॉरपोरेट घरानों की जेब भरने के लिए राज्यों के संवैधानिक अधिकारों की बलि चढ़ा रही है।

झारखंडियों का बलिदान और केंद्र का दोहरा रवैया
झारखंडी जनभावनाओं और दर्द को उकेरते हुए हेमंत सोरेन ने लिखा कि देश की प्रगति की नींव में झारखंड का पसीना और त्याग छुपा है। पूरे देश को कोयला, लोहा और तांबा देकर रौशन करने वाला झारखंड खुद विस्थापन, प्रदूषण, बीमारियों और तबाही का दंश झेलता रहा है। हमारे आदिवासी और मूलवासी अपनी पीढ़ियों की जमीन गंवाकर औद्योगिक विकास की कीमत चुकाते हैं। ऐसे में जब राज्य सरकार अपने ही संसाधनों से जनता का हक वसूलकर उनका कल्याण करना चाहती है, तो केंद्र सरकार नया कानून बनाकर उस हक को छीनने पर आमादा है। सोरेन ने कहा कि झारखंड सिर्फ संसाधनों की लूट का केंद्र बनकर नहीं रह सकता; यहाँ की संपदा का पहला अधिकार यहाँ की पीड़ित जनता का है।

गरीब, महिला और बुजुर्गों के मुंह से निवाला छीनने की कोशिश
वित्तीय आंकड़ों के जरिए चोट करते हुए सोरेन ने चेताया कि ‘झारखंड मिनरल बियरिंग लैंड सेस’ से राज्य को वर्ष 2026-27 में लगभग 13,215 करोड़ रुपये का राजस्व मिलने का अनुमान था। इसी अधिकार के दम पर आज राज्य सरकार ‘मुख्यमंत्री मंईयां सम्मान योजना’ के तहत 50 लाख से अधिक गरीब बहनों और महिलाओं के बैंक खातों में आर्थिक मदद भेज पा रही है। इसके अलावा गांव-देहात के स्कूलों, अस्पतालों, पेयजल और बुनियादी सुविधाओं का ढांचा इसी से खड़ा हो रहा है। यदि केंद्र का यह काला कानून लागू होता है, तो राज्य की वित्तीय शक्ति छिन जाएगी। यह सीधा हमला राज्य के किसानों, महिलाओं, युवाओं और अंतिम पायदान पर खड़े आदिवासियों की रोजी-रोटी और कल्याणकारी योजनाओं पर है।

राष्ट्रपति से गुहार और निर्णायक लड़ाई का ऐलान
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु के झारखंड के राज्यपाल रहने और आदिवासी पृष्ठभूमि से होने का सीधा वास्ता देते हुए सोरेन ने अपनी चिट्ठी को एक भावनात्मक मोड़ दिया। उन्होंने कहा कि राष्ट्रपति महोदया ने खुद यहाँ के आदिवासियों के संघर्ष और कष्टों को करीब से देखा है। ऐसे में सोरेन ने उनसे अपने सर्वोच्च संवैधानिक अधिकारों का इस्तेमाल करने की अपील की। सोरेन ने कड़े शब्दों में साफ कर दिया है कि झारखंड अपने हक और स्वाभिमान से कोई समझौता नहीं करेगा। यदि केंद्र सरकार ने अपने तानाशाही रवैये को पीछे नहीं खींचा, तो झारखंड की माटी और यहाँ की जनता के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के लिए इस लड़ाई को सड़क से लेकर न्यायपालिका तक पूरी ताकत से लड़ा जाएगा
