मानसिक और प्रशासनिक उत्पीड़न के आरोपों में घिरीं रिनपास निदेशक जयति सिमलई? डॉक्टर सिद्धार्थ सिन्हा ने खोला मोर्चा

रांची
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पागलखाने में इलाज किसका हो रहा है?

रिनपास में इन दिनों मरीजों से ज्यादा वहां के डॉक्टरों के दिमागी सुकून का इलाज चल रहा है। विडंबना की पराकाष्ठा देखिए कि जो संस्थान दूसरों के डिप्रेशन और मानसिक तनाव को ठीक करने का बोर्ड टांगकर बैठा है, उसी के मनोचिकित्सक डॉ. सिद्धार्थ सिन्हा आज खुद को गंभीर अवसाद का मरीज बता रहे हैं। डॉ. सिन्हा ने संस्थान की प्रभारी निदेशक डॉ. जयति सिमलई पर सीधे-सीधे मानसिक उत्पीड़न और लगातार प्रताड़ित करने का संगीन आरोप जड़ा है। रिनपास के इस अनोखे प्रशासनिक इलाज से तंग आकर आखिरकार डॉक्टर साहब को खुद अपनी मानसिक हालत की दुहाई देते हुए इंसाफ की गुहार लगानी पड़ रही है।

मीटिंग से गायब होने पर नोटिस या दुश्मनी निकालने का बहाना?

विवाद की चिंगारी भड़की 11 जुलाई 2026 को हुई एक बैठक से, जिसमें डॉ. सिद्धार्थ सिन्हा अनुपस्थित रहे। इसके बाद संस्थान के उप-निदेशक द्वारा 13 जुलाई को पत्रांक 1749 के जरिए उन्हें एक कारण पृच्छा नोटिस थमा दिया गया। इसके जवाब में डॉ. सिन्हा ने जो पत्र लिखा है, उसने संस्थान की कार्यशैली को ही कटघरे में खड़ा कर दिया है। डॉ. सिन्हा का कहना है कि उन्होंने बाकायदा मौखिक और टेलीफोनिक रूप से छुट्टी की अनुमति ली थी क्योंकि उन्हें ओपीडी परिसर में एक अन्य डॉक्टर द्वारा जान से मारने की धमकी और गाली-गलौज का सामना करना पड़ा था। लेकिन बिना किसी जांच के, उन्हें सीधे दोषी मानकर अनुशासनात्मक कार्रवाई की धमकी देना कहां का न्याय है?

मुझे लगातार प्रताड़ित किया जा रहा है : डॉ सिद्धार्थ

डॉक्टर साहब के पत्रों के मुताबिक, डॉ. सिद्धार्थ सिन्हा को संस्थान के भीतर लगातार और सिलसिलेवार ढंग से प्रताड़ित किया जा रहा है। इस मानसिक प्रताड़ना की कहानी तब और दिलचस्प हो जाती है जब डॉ. सिन्हा को ओपीडी परिसर में ही एक अन्य डॉक्टर द्वारा जान से मारने की धमकी मिलती है और वे सुरक्षा की भीख मांगते हुए तीन-तीन ईमेल भेजते हैं। लेकिन रिनपास का संवेदनशील प्रशासन सुरक्षा गार्ड देने के बजाय उन्हें 11 जुलाई की बैठक में अनुपस्थित रहने पर कारण बताओ नोटिस थमा देता है! डॉ. सिन्हा का आरोप है कि उन्होंने छुट्टी की मौखिक अनुमति ली थी, लेकिन रिनपास के नियम शायद इतने पागल कर देने वाले हैं कि सुरक्षा मांगने वाले डॉक्टर को ही सीधे अपराधी और अनुशासनहीन घोषित करने की होड़ मची हुई है।

निदेशक महोदया, यह कैसी व्यवस्था है?

जब एक डॉक्टर अपनी सुरक्षा की गुहार लेकर बार-बार ईमेल और गुजारिशें भेज रहा है, तो उस पर ध्यान देने के बजाय उसे शो-कॉज नोटिसों की अंतहीन श्रृंखला में क्यों उलझाया जा रहा है? डॉ. सिन्हा ने अपने पत्र में लिखा है कि प्रभारी निदेशक के वर्ष 2022 से पदभार संभालने के बाद से ही संस्थान में कार्यरत विशेषज्ञ डॉक्टरों की छवि धूमिल करने और उन्हें प्रताड़ित करने की होड़ मची हुई है। ऐसे में सवाल यह उठता है कि क्या रिनपास की प्रशासनिक प्रमुख का ध्यान डॉक्टरों की सुरक्षा और मरीजों के सुचारू इलाज पर है, या फिर केवल कागजी नोटिसों के जरिए अपनी प्रशासनिक धौंस जमाने पर?

डॉक्टर साहब लिखते हैं कि उनकी मां का देहांत हो चुका है, घर पर 72 साल के बुजुर्ग पिता, पत्नी और बच्चा है। ऐसे में बिना किसी गलती के रोज-रोज नए षड्यंत्र रचना और पेशेवर छवि को धूमिल करना, क्या संस्थान के प्रमुख की कार्यशैली का हिस्सा बन चुका है? जो डॉक्टर दिन-रात मानसिक रोगियों का इलाज करते है, उन्हें ही इस कदर असहाय और अकेला महसूस करा देना किसी उत्कृष्ट प्रशासनिक कला से कम नहीं है।

रिनपास प्रशासन के आधिकारिक बयान के बाद अपडेट होगी खबर

द जन सभा के पाठकों के लिए यह जानना जरूरी है कि इस पूरे ड्रामे और गंभीर आरोपों पर अब तक आरोपी पक्ष यानी रिनपास प्रशासन की तरफ से कोई जुबान नहीं खुली है। हमने रिनपास की प्रभारी निदेशक डॉ. जयति सिमलई से संपर्क साधने और उनका पक्ष जानने का पूरा प्रयास किया, लेकिन फिलहाल वहां से रहस्यमयी चुप्पी ओढ़ ली गई है। जैसे ही इस मानसिक खींचतान और प्रशासनिक दंगल पर रिनपास की तरफ से कोई भी आधिकारिक बयान, सफाई या स्पष्टीकरण सामने आएगा, इस खबर को अपडेट कर दिया जाएगा। तब तक यह देखना दिलचस्प होगा कि दूसरों का दिमागी संतुलन ठीक करने वाले इस संस्थान के भीतर का संतुलन कब तक पटरी पर लौटता है।

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