द जन सभा | निरंजन भारती
झारखंड के सबसे प्रतिष्ठित और एकमात्र मानसिक स्वास्थ्य संस्थान RINPAS की प्रभारी निदेशक जयती सिमलई के स्वास्थ्य को लेकर विभागीय गलियारों में चल रही खबरों ने राज्य के पूरे स्वास्थ्य महकमे को कटघरे में खड़ा कर दिया है। सूत्रों और अपुष्ट खबरों के अनुसार, हाल ही में हुई एक बड़ी चिकित्सीय जांच में उनके दिमाग में एक संवेदनशील स्वास्थ्य समस्या होने की बात सामने आई है। चूंकि पूर्व में उनका ब्रेन हेमरेज भी हो चुका है और चिकित्सकों ने उन्हें आगे की पुष्टि के लिए तुरंत एमआरआई कराने की सलाह दी है, ऐसे में अत्यधिक प्रशासनिक तनाव उनके स्वास्थ्य के हित में बिल्कुल नहीं है।

कायदे से इस संवेदनशील मोड़ पर स्वास्थ्य मंत्री इरफान अंसारी को इंसानियत दिखानी चाहिए थी और डॉक्टर सिमलई को तुरंत पद की भारी जिम्मेदारियों से मुक्त कर उन्हें अपना इलाज कराने की पूरी सहूलियत देनी चाहिए थी। लेकिन करोड़ों की आबादी वाले इस सूबे की प्रशासनिक लाचारी देखिए कि संस्थान में कई सक्षम एवं योग्य अधिकारी मौजूद होने के बावजूद, स्वास्थ्य विभाग को रिनपास जैसी बड़ी संस्था का प्रभार सौंपने के लिए कोई दूसरा विकल्प नहीं सूझ रहा है।
वहीं चिकित्सा विशेषज्ञों की मानें तो ब्रेन ट्यूमर जैसे संवेदनशील स्थिति से जूझ रहे किसी भी मरीज को तत्काल हर प्रकार के कड़े प्रशासनिक और मानसिक तनाव से दूर रहना चाहिए, क्योंकि अत्यधिक काम का बोझ उनकी सेहत को और ज्यादा नाजुक बना सकता है। ऐसे में इस स्थिति के बावजूद एक मरीज को जबरन कुर्सी से चिपकाए रखना स्वास्थ्य विभाग की घोर प्रशासनिक क्रूरता और असंवेदनशीलता को ही दर्शाता है। एक तरफ रिनपास में पूरे सूबे के मानसिक रोगियों के उपचार का जिम्मा है, और दूसरी तरफ विभाग ने संस्थान की मुखिया को ही खुद की जिंदगी की इतनी बड़ी जंग में प्रशासनिक काम के बोझ तले दबाकर छोड़ दिया है। आखिर विभाग की ऐसी क्या मजबूरी है जो वह एक संवेदनशील स्वास्थ्य समस्या से जूझ रही अधिकारी को आराम देने के बजाय जिंदगी की इतनी बड़ी जंग में अकेला छोड़ दिया है। स्वास्थ्य विभाग की यह स्थिति डॉक्टर सिमलई के प्रति कोई हमदर्दी नहीं, बल्कि स्वास्थ्य तंत्र की उस बदहाली का जीता-जागता सबूत है जहां पूरा महकमा खुद नीतिगत रूप से लकवाग्रस्त नजर आ रहा है।
