द जन सभा | निरंजन भारती
रांची का कांके इलाका आमतौर पर अपनी ठंडी हवाओं और राज्य के अग्रणी मानसिक आरोग्यशाला के शांत माहौल के लिए जाना जाता है। लेकिन इन दिनों रिनपास के प्रशासनिक गलियारों में एक अलग ही सरगर्मी है। विभागीय जानकार बताते हैं कि सरकारें बदल जाती हैं, आला अफसर बदल जाते हैं, यहाँ तक कि समयानुसार मौसम भी अपना मिजाज बदल लेता है; लेकिन रिनपास के दो खास कारिंदों की कुर्सियां और उनके अधिकार अपनी जगह से टस से मस नहीं होते। राज्य के मुख्य सचिव अविनाश कुमार ने वित्तीय गड़बड़ियों और फर्जी दस्तावेजों के आधार पर हो रही अवैध निकासी की रोकथाम के लिए 28 अप्रैल 2026 को एक सख्त आदेश जारी किया था।

मुख्य सचिव ने आदेश पत्र में लिखा था कि विभिन्न जिलों व कार्यालयों में वेतन मद व कोषगार के माध्यम से अवैध निकासी, कर्मचारी विवरण में छेड़छाड़ और फर्जी दस्तावेजों के आधार पर राशि अन्य खातों में अंतरित किए जाने जैसी गंभीर अनियमितताएं प्रकाश में आई हैं। अतः वित्तीय कार्यों से जुड़े वरीय लेखा सहायक, लेखा सहायक, लेखा अधीक्षक, लेखापाल और विपत्र लिपिक का एक ही स्थान पर पदस्थापन 3 वर्ष से अधिक होने पर उनका स्थानांतरण अनिवार्य रूप से सुनिश्चित किया जाए, तथा संविदा व मानदेय पर कार्यरत कंप्यूटर ऑपरेटरों को वित्तीय कार्यों से पूरी तरह दूर रखा जाए। और प्रशासनिक नियम कहता है कि एक ही मेज पर तीन साल से अधिक समय तक जमे रहने से व्यवस्था में दीमक लगने की आशंका रहती है, पर रिनपास में तो उस दीमक को ही इमारत का शहतीर मान लिया गया है।
मुख्य सचिव के इस आदेश के आलोक में स्वास्थ्य, चिकित्सा शिक्षा एवं परिवार कल्याण विभाग की संयुक्त सचिव सीमा कुमारी उदयपुरी ने भी पत्र जारी कर रिनपास निदेशक सहित राज्य के सभी प्रमुख चिकित्सा संस्थानों को एक सप्ताह के भीतर अनुपालन रिपोर्ट उपलब्ध कराने का निर्देश दिया था। लेकिन उपलब्ध दस्तावेजों के अनुसार, रिनपास प्रशासन ने स्थानांतरण की प्रक्रिया अपनाने के बजाय एक नया कार्यालय आदेश जारी कर पुरानी व्यवस्था पर ही मुहर लगा दी। इस आदेश के तहत लेखापाल विनय कुमार और विपत्र लिपिक मनोज कुमार को न केवल वर्ष 2021-22 से चले आ रहे सभी महत्वपूर्ण वित्तीय प्रभार जैसे GeM टेंडर, ऑडिट, वर्क्स संचिका, सुरक्षा व कैंटीन विपत्र पर बनाए रखा गया, बल्कि एक-दूसरे की अनुपस्थिति में आपसी प्रभार संभालने का अधिकार भी दे दिया गया। इस प्रकार, सर्वोच्च प्रशासनिक स्तर से जारी अनिवार्य तबादले के निर्देशों को ताक पर रखकर रिनपास में उसी चौकड़ी-तंत्र को यथावत बनाए रखा गया, जिस पर अब वित्तीय नियमों की अनदेखी और गंभीर अनियमितताओं के सवाल उठ रहे हैं।
उपलब्ध दस्तावेजों और रिनपास के कार्यालय आदेश के अनुसार, स्थानांतरण प्रक्रिया पूरी करने के बजाय दोनों संबंधित कर्मियों के प्रभार को पुनः अधिसूचित करते हुए व्यवस्था को यथावत बनाए रखा गया। इस आदेश के तहत जहां एक ओर लेखापाल विनय कुमार को संस्थान के सभी विपत्रों को जांचोपरांत पारित करने, वित्त व एजी (AG) अंकेक्षण, लेखा उप-समिति और वर्क्स कमेटी के एजेंडे का प्रभार दिया गया; वहीं दूसरी ओर, लिपिक मनोज कुमार को निविदा का सम्पूर्ण प्रभार, GeM पोर्टल संबंधी ऑनलाइन कार्य, खाद्य सामग्री विपत्र, मेकेनिकल लॉन्ड्री, सैनिटेशन और सुरक्षा सेवा का संपूर्ण प्रभार सौंपा गया। दिलचस्प बात यह है कि इस आदेश में यह स्पष्ट प्रावधान भी किया गया कि एक की अनुपस्थिति में दूसरा व्यक्ति उसका प्रभार संभालेगा। इस प्रकार, सर्वोच्च प्रशासनिक स्तर से जारी स्थानांतरण के कड़े निर्देशों के बावजूद रिनपास में उसी चौकड़ी-तंत्र को बनाए रखा गया, जिससे वित्तीय नियमों की अनदेखी और प्रक्रियाओं पर लगातार गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।
संस्थान से जुड़े सूत्रों का दावा है कि प्रशासनिक नियंत्रण की इस व्यवस्था के कारण जमीनी स्तर पर कार्यप्रणाली काफी प्रभावित हुई है। उदाहरण के तौर पर, ऑनलाइन खरीदारी GeM पोर्टल की प्रक्रिया में बायर के रूप में नामित डॉक्टरों की भूमिका कथित रूप से केवल समय-समय पर मोबाइल पर आने वाले ओटीपी साझा करने तक ही सीमित रह गई। आरोप है कि सामान की दर, मात्रा या गुणवत्ता की विस्तृत जानकारी दिए बिना प्रक्रिया पूरी करने के दबाव से परेशान होकर जब पूर्व में एक मनोचिकित्सक ने इस जिम्मेदारी से हटने का निर्णय लिया, तो उन्हें प्रशासनिक स्तर पर शो-कॉज नोटिस का सामना करना पड़ा। बाद में यह जिम्मेदारी संभालने वाले दूसरे चिकित्सक ने भी स्थितियों की गंभीरता को देखते हुए प्रभारी निदेशक को लिखित सुझाव दिया कि किसी भी खरीद से पहले परचेज कमेटी की विधिवत बैठक आयोजित की जानी चाहिए, न कि आदेश पारित होने के बाद औपचारिक हस्ताक्षर कराए जाएं।
विशेषज्ञों का मानना है कि उच्च स्तरीय शासकीय आदेशों के बावजूद किसी संस्थान में तीन वर्ष से अधिक समय से वित्तीय पदों पर आसीन कर्मियों को स्थानांतरित न करना प्रथम दृष्टया नीतिगत अवहेलना का मामला बनता है। विधिक विशेषज्ञों के अनुसार, यद्यपि स्वायत्त संस्थानों को अपने आंतरिक कार्यों के लिए प्रशासनिक स्वतंत्रता प्राप्त होती है, परंतु जब मामला राज्य कोष, टेंडर प्रक्रियाओं और सरकारी अनुदान का हो, तो राज्य सरकार व मुख्य सचिव के निर्देश सर्वोपरि होते हैं।
इसी बीच, पूरे घटनाक्रम के उजागर होने पर मुख्य विपक्षी दल भाजपा ने राज्य सरकार और स्वास्थ्य विभाग पर तीखा हमला बोला है। भाजपा नेताओं का आरोप है कि रिनपास में मुख्य सचिव के आदेश की अनदेखी केवल एक प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि वित्तीय अनियमताओं को संरक्षण देने की कोशिश है। विपक्षी नेताओं ने GeM टेंडर व खरीदारी प्रक्रियाओं की निष्पक्ष एजेंसी से उच्चस्तरीय जांच और दोषी अधिकारियों पर त्वरित कार्रवाई की मांग की है। वही दूसरी ओर, रिनपास प्रशासन ने विभाग को भेजे पत्र में यह तर्क दिया है कि संस्थान के समस्त वित्तीय कार्य स्वायत्त व्यवस्था के तहत मुख्य वित्तीय सलाहकार के मार्गदर्शन में नियमानुसार संपादित किए जा रहे हैं, हालांकि मुख्य सचिव के अनिवार्य स्थानांतरण आदेश की अनदेखी के सवाल पर रिनपास की ओर से आधिकारिक स्पष्टीकरण आना अभी बाकी है।
