
द जन सभा डेस्क | रांची
रांची में चेन स्नेचिंग की घटनाओं को लेकर पुलिस मुख्यालय स्तर पर ही नहीं, बल्कि फील्ड पुलिसिंग को केंद्र में रखकर कार्रवाई की तैयारी दिखाई दे रही है। वरीय पुलिस अधीक्षक की अध्यक्षता में बुधवार को हुई बैठक में जिस तरह घटनाओं के पैटर्न, अपराधियों के संभावित रूट, एग्जिट प्वाइंट, संवेदनशील इलाकों और तकनीकी साक्ष्यों की समीक्षा के निर्देश दिए गए हैं, उससे साफ है कि पुलिस अब प्रत्येक घटना को अलग-अलग केस के रूप में देखने के बजाय इनके बीच मौजूद संभावित कड़ियों को तलाशने की कोशिश कर रही है। खास तौर पर पूर्व में हुई घटनाओं का केसवार और स्थानवार विश्लेषण इस रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा है। चेन स्नेचिंग जैसे अपराधों में अपराधी अक्सर भीड़भाड़ वाले इलाकों, बाजार, चौक-चौराहों या ऐसे स्थानों को निशाना बनाते हैं जहां पीड़ित को तुरंत मदद मिलने की संभावना कम हो और घटना के बाद तेजी से निकलने के रास्ते उपलब्ध हों। पुलिस ने इसी वजह से हॉटस्पॉट और संवेदनशील क्षेत्रों की पहचान पर जोर दिया है। इन स्थानों पर नियमित पुलिस गश्ती के साथ-साथ सादे लिबास में पुलिसकर्मियों की तैनाती की योजना बनाई गई है। इसका उद्देश्य केवल घटना के बाद अपराधियों को पकड़ना नहीं, बल्कि अपराध से पहले संदिग्ध गतिविधियों पर नजर रखना भी है।
बैठक में अपराधियों के संभावित आवागमन मार्ग और एग्जिट प्वाइंट को चिन्हित करने पर विशेष जोर दिया गया। क्योंकि किसी भी चेन स्नेचिंग की जांच में घटनास्थल के साथ-साथ घटना के बाद अपराधी किस दिशा में गया, उसने कौन-सा रास्ता चुना और वहां से आगे किस इलाके में पहुंचा ये सवाल जांच की दिशा तय कर सकते हैं। इसी वजह से घटनास्थल से लेकर संभावित भागने के रास्तों तक उपलब्ध CCTV फुटेज की व्यवस्थित समीक्षा करने का निर्देश दिया गया है। CCTV इस पूरी रणनीति की सबसे अहम कड़ी बनकर सामने आ रहा है। पुलिस केवल घटनास्थल का कैमरा देखने तक सीमित नहीं रहना चाहती, बल्कि आसपास के रास्तों और संभावित एग्जिट रूट के कैमरों को जोड़कर अपराधी की पूरी मूवमेंट तैयार करने की कोशिश करेगी। जहां CCTV कैमरे उपलब्ध नहीं हैं, वहां स्थानीय स्तर पर कैमरे लगाने को प्रोत्साहित करने की बात भी कही गई है। हालांकि किसी घटना के सफल उद्भेदन में CCTV की उपयोगिता इस बात पर निर्भर करेगी कि कैमरे की लोकेशन, फुटेज की गुणवत्ता और घटना के समय रिकॉर्डिंग उपलब्ध है या नहीं। पुलिस ने अपराधियों के संभावित रूट पर वाहन चेकिंग और पुलिस बल की तैनाती को भी रणनीति में शामिल किया है। इसके पीछे मूल उद्देश्य यह है कि घटना के तुरंत बाद अपराधी जिस रास्ते से निकलने की कोशिश कर सकते हैं, उन मार्गों पर निगरानी बढ़ाई जाए। आवश्यकता के अनुसार विशेष बल की प्रतिनियुक्ति का निर्देश भी दिया गया है। यानी पुलिस की रणनीति अब केवल थाना क्षेत्र की सीमाओं के भीतर कार्रवाई तक सीमित न रहकर संभावित मूवमेंट कॉरिडोर तक निगरानी बढ़ाने की है। पूर्व में हुई घटनाओं के त्वरित उद्भेदन के लिए SIT का गठन किया जाना भी इस बैठक का महत्वपूर्ण निर्णय है। इसका मतलब यह है कि पुलिस पुराने मामलों को लंबित रिकॉर्ड के रूप में छोड़ने के बजाय उन्हें दोबारा विश्लेषण के दायरे में लाने की कोशिश कर रही है। अलग-अलग घटनाओं में इस्तेमाल हुए तरीके, समय, स्थान, अपराधियों की संख्या, वाहन और भागने के रास्ते जैसे तथ्यों को आपस में मिलाकर देखा जा सकता है। यदि अलग-अलग मामलों में समान पैटर्न सामने आता है, तो जांच एजेंसियों को संभावित गिरोह या आपसी कनेक्शन तक पहुंचने में मदद मिल सकती है।टेक्निकल सेल को CCTV, मोबाइल और अन्य तकनीकी साक्ष्यों के विश्लेषण की जिम्मेदारी दिए जाने से जांच का दूसरा महत्वपूर्ण पक्ष सामने आता है। आधुनिक अपराधों में तकनीकी साक्ष्य कई बार प्रत्यक्षदर्शी की जानकारी से अधिक महत्वपूर्ण साबित हो सकते हैं, लेकिन इनसे मिली जानकारी की कानूनी और वैज्ञानिक तरीके से पुष्टि भी उतनी ही जरूरी होती है। पुलिस का फोकस अपराधियों की पहचान के साथ-साथ उनके नेटवर्क और संभावित सहयोगियों तक पहुंचने पर भी है।
पुलिस ने पूर्व में चेन स्नेचिंग या समान प्रकृति के अपराधों में शामिल रहे अपराधियों की प्रोफाइलिंग और सत्यापन की प्रक्रिया शुरू करने की बात कही है। जेल से बाहर आए अपराधियों की गतिविधियों पर विशेष निगरानी भी इसी रणनीति का हिस्सा है। यहां पुलिस के सामने दोहरी चुनौती होगी एक तरफ पुराने अपराध रिकॉर्ड के आधार पर संदिग्ध गतिविधियों पर नजर रखना और दूसरी तरफ जांच को ठोस साक्ष्यों के आधार पर आगे बढ़ाना। केवल पुराने आपराधिक रिकॉर्ड के आधार पर किसी व्यक्ति को किसी नई घटना से जोड़ना पर्याप्त नहीं होगा; नई घटना से संबंधित साक्ष्य भी जांच का हिस्सा होंगे। महिलाओं की आवाजाही वाले क्षेत्रों, बाजारों, चौक-चौराहों और भीड़भाड़ वाले इलाकों में विशेष गश्ती के निर्देश यह संकेत देते हैं कि पुलिस रोकथाम को जांच जितना ही महत्वपूर्ण मान रही है। चेन स्नेचिंग में पीड़ित को घटना का पता लगने और पुलिस के पहुंचने के बीच का समय काफी महत्वपूर्ण हो सकता है। ऐसे में संवेदनशील स्थानों पर पुलिस की मौजूदगी और संदिग्ध गतिविधियों पर तत्काल प्रतिक्रिया अपराध को रोकने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। अब चुनौती इन निर्देशों को जमीन पर लागू करने की है। बैठक में रणनीति और निर्देश तय कर दिए गए हैं, लेकिन इसका वास्तविक असर इस बात पर निर्भर करेगा कि हॉटस्पॉट की पहचान कितनी सटीक होती है, CCTV नेटवर्क कितना प्रभावी तरीके से इस्तेमाल किया जाता है, SIT पुराने मामलों को कितनी तेजी से आगे बढ़ाती है और टेक्निकल सेल से मिलने वाले इनपुट पर फील्ड पुलिस कितनी तेजी से कार्रवाई करती है। इसके साथ ही प्रत्येक नई घटना की FIR, घटनास्थल की जांच, CCTV संग्रह और संदिग्धों की पहचान में शुरुआती घंटों की भूमिका भी महत्वपूर्ण होगी। अब निगाह इस बात पर होगी कि इन निर्देशों का असर कितनी जल्दी जमीन पर दिखाई देता है और पूर्व में हुई चेन स्नेचिंग की घटनाओं में SIT तथा संबंधित थाना पुलिस कितने मामलों का वास्तविक उद्भेदन कर पाती है।
