एक ही क्षेत्र, एक ही CCL प्रबंधन, फिर दो नियम क्यों? चंद्रगुप्त की कथित वसूली पर उठे बड़े सवाल

रांची
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द जन सभा | गणेश प्रसाद, टंडवा

आम्रपाली-चंद्रगुप्त कोल क्षेत्र की चंद्रगुप्त परियोजना में ट्रकों से कथित वसूली को लेकर अब सवाल लगातार गहराते जा रहे हैं। सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे वीडियो और पोस्ट में दावा किया जा रहा है कि विस्थापितों के नाम पर ट्रकों से हजारों रुपये की राशि ली जा रही है। कुछ वायरल दावों में इस रकम को प्रतिबंधित उग्रवादी संगठनों तक पहुंचाए जाने की बात भी कही जा रही है। हालांकि, इन दावों की पुष्टि अभी नहीं हुई है और यह स्पष्ट होना बाकी है कि वास्तव में कितनी राशि वसूली जा रही है और किसके निर्देश पर वसूली हो रही है और इस पूरी व्यवस्था को किस स्तर से अनुमति मिली है। लेकिन इन आरोपों ने CCL प्रबंधन के सामने एक ऐसा सवाल खड़ा कर दिया है, जिसका जवाब अब स्थानीय ग्रामीण और रैयत सीधे तौर पर मांग रहे हैं अगर आम्रपाली और चंद्रगुप्त दोनों एक ही क्षेत्र में हैं, दोनों का प्रबंधन CCL के पास है और दोनों परियोजनाओं में विस्थापित एवं प्रभावित लोगों का सवाल जुड़ा हुआ है, तो फिर दोनों जगहों पर नियम और व्यवस्था अलग-अलग क्यों दिखाई देती है?

स्थानीय ग्रामीणों का पहला सवाल सीधे CCL प्रबंधन से है। उनका कहना है कि यदि चंद्रगुप्त परियोजना में भू-रैयत एवं विस्थापित प्रभावित समिति के नाम पर ट्रकों से लोडिंग के दौरान कथित तौर पर 3,000 से 4,000 रुपये तक की राशि ली जा रही है और यदि CCL प्रबंधन इस व्यवस्था को किसी रूप में अधिकृत या वैध मानता है, तो फिर यही व्यवस्था आम्रपाली परियोजना में क्यों नहीं है? ग्रामीणों का तर्क है कि दोनों परियोजनाएं एक ही व्यापक कोल क्षेत्र का हिस्सा हैं और दोनों जगह विस्थापित रैयतों के हितों की बात होती है। ऐसे में नियम यदि एक हैं तो व्यवस्था अलग क्यों है और यदि नियम अलग हैं तो उसका लिखित आधार क्या है? CCL को यह स्पष्ट करना चाहिए कि चंद्रगुप्त परियोजना में ट्रकों से राशि लेने की अनुमति किस आदेश के तहत दी गई है, किस समिति को दी गई है, राशि किस मद में ली जाती है और उस पैसे का हिसाब-किताब किसके पास रहता है। केवल किसी समिति का नाम या लेटर पैड होना अपने आप में किसी आर्थिक वसूली को वैध साबित नहीं करता; इसकी वैधता संबंधित सरकारी और CCL नियमों तथा अधिकृत आदेशों से ही तय होगी।

दूसरा सवाल इससे भी गंभीर है। यदि CCL प्रबंधन यह कहता है कि ट्रकों से इस तरह की कोई राशि लेना अधिकृत नहीं है और किसी समिति या समूह द्वारा जबरन पैसे की वसूली की जा रही है, तो फिर ऐसी कथित वसूली पर कार्रवाई क्यों नहीं हो रही है? अगर किसी व्यक्ति, समिति या समूह के पास CCL की ओर से कोई अधिकृत अनुमति नहीं है और इसके बावजूद ट्रांसपोर्टरों या वाहन चालकों से पैसा लिया जा रहा है, तो पुलिस और प्रशासन को इसकी जांच करनी चाहिए। वायरल वीडियो में यदि किसी प्रतिबंधित उग्रवादी संगठन से संबंध या टेरर फंडिंग जैसे गंभीर आरोप लगाए गए हैं, तो इन आरोपों की पुष्टि या खंडन जांच के जरिए होना चाहिए। सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो को अंतिम सत्य नहीं माना जा सकता, लेकिन इतने गंभीर आरोप सामने आने के बाद जांच नहीं होना भी अपने आप में कई सवाल खड़े करता है। पुलिस, प्रशासन और CCL प्रबंधन को यह स्पष्ट करना चाहिए कि क्या उन्होंने वायरल वीडियो और उसमें लगाए गए आरोपों का संज्ञान लिया है, क्या कोई जांच शुरू की गई है और यदि जांच हुई है तो उसका निष्कर्ष क्या है।

इस पूरे मामले में सोशल मीडिया पर तीन महीने में करीब 10 करोड़ रुपये की कथित वसूली के दावे भी किए जा रहे हैं। लेकिन इस आंकड़े की स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हुई है। इसलिए असली सवाल यही है कि 10 करोड़ रुपये का आंकड़ा आया कहां से? कितने ट्रक प्रतिदिन चंद्रगुप्त परियोजना में आते हैं, कितने ट्रकों से कथित तौर पर पैसा लिया जाता है, प्रति ट्रक कितनी राशि ली जाती है, रकम नकद ली जाती है या बैंक के माध्यम से, इसके लिए कोई रसीद दी जाती है या नहीं और इस रकम का हिसाब किस रिकॉर्ड में दर्ज है? यदि वास्तव में इतनी बड़ी राशि की वसूली हुई है तो उसके प्रमाण वित्तीय लेन-देन, ट्रांसपोर्टरों के बयान, रसीद, रजिस्टर, बैंक खातों और अन्य दस्तावेजों के जरिए सामने आने चाहिए। यही वे तथ्य हैं जो यह तय करने में मदद करेंगे कि मामला वास्तव में क्या है।

इस मामले को गंभीर बनाने वाली एक और बात यह है कि आम्रपाली-मगध कोयला क्षेत्र पहले भी उग्रवादी संगठनों के लिए कथित लेवी वसूली से जुड़े मामलों के कारण जांच एजेंसियों के रडार पर रहा है। ऐसे मामलों में अदालतों के स्तर पर भी कार्रवाई हुई है। इसलिए चंद्रगुप्त परियोजना में सामने आए नए आरोपों को केवल सोशल मीडिया की बहस मानकर छोड़ देना उचित नहीं होगा। यदि आरोप गलत हैं तो जांच के जरिए यह स्पष्ट किया जाना चाहिए कि आरोपों में कोई तथ्य नहीं है और यदि आरोप सही पाए जाते हैं तो जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कानून के अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए। दोनों ही परिस्थितियों में सबसे ज्यादा जरूरी है कि स्थिति अस्पष्ट न रहे।

अब सबसे बड़ी जिम्मेदारी CCL प्रबंधन की बनती है। CCL को सार्वजनिक रूप से यह स्पष्ट करना चाहिए कि चंद्रगुप्त परियोजना में विस्थापितों के नाम पर ट्रकों से किसी तरह की राशि लेने की अनुमति है या नहीं। यदि अनुमति है तो उसका आदेश क्या है, किस समिति को अधिकार दिया गया है, प्रति वाहन कितनी राशि निर्धारित है, राशि किस खाते में जमा होती है और उसका उपयोग किस काम के लिए किया जाता है। यदि ऐसी कोई अनुमति नहीं है तो फिर कंपनी की परियोजना और उसके परिवहन नेटवर्क में कथित तौर पर यह वसूली कैसे चल रही है? यही सवाल उस कथित दोहरे मानदंड की ओर इशारा करता है, जिसकी चर्चा अब ग्रामीणों के बीच हो रही है एक ही क्षेत्र, एक ही CCL प्रबंधन और एक ही तरह का कोयला कारोबार, लेकिन व्यवस्था अलग-अलग क्यों?

स्थानीय रैयतों का कहना है कि विस्थापितों और प्रभावित परिवारों के अधिकारों के नाम पर यदि कोई व्यवस्था बनाई गई है तो उसे पारदर्शी बनाया जाना चाहिए। किसे कितना लाभ मिल रहा है, किस आधार पर मिल रहा है और राशि का हिसाब कहां है इन सभी सवालों का जवाब दस्तावेजों के साथ सामने आना चाहिए। वहीं, यदि विस्थापितों के नाम का इस्तेमाल केवल वसूली के लिए किया जा रहा है तो ऐसे लोगों के खिलाफ कार्रवाई भी जरूरी है। ग्रामीणों की मांग है कि यदि जांच में कथित वसूली की रकम का संबंध किसी प्रतिबंधित उग्रवादी संगठन या टेरर फंडिंग से सामने आता है, तो मामले की गंभीरता के अनुसार केंद्रीय जांच एजेंसियों को भी इसकी जांच करनी चाहिए। लेकिन फिलहाल यह एक मांग है; किसी संगठन या व्यक्ति के खिलाफ ऐसा निष्कर्ष जांच और कानूनी प्रक्रिया के बिना नहीं निकाला जा सकता।

चंद्रगुप्त परियोजना को लेकर उठ रहे सवालों का जवाब अब बयानबाजी से नहीं, बल्कि दस्तावेजों और जांच से मिलना चाहिए। CCL बताए कि व्यवस्था वैध है या नहीं। पुलिस बताए कि वायरल वीडियो और वसूली के आरोपों पर क्या कार्रवाई की गई। प्रशासन बताए कि उसे इस कथित वसूली की जानकारी है या नहीं। और यदि कोई समिति CCL के नाम या लेटर पैड का इस्तेमाल कर राशि वसूल रही है तो कंपनी यह भी स्पष्ट करे कि उस समिति को वास्तविक अधिकार किसने दिया है। क्योंकि सवाल अब सिर्फ 3,000 या 4,000 रुपये प्रति ट्रक का नहीं है; सवाल यह है कि क्या CCL की एक ही परियोजना व्यवस्था में दो अलग-अलग नियम चल रहे हैं, और अगर चल रहे हैं तो उनका आधार क्या है? अब देखना यह है कि CCL प्रबंधन इन सवालों का जवाब कब देता है और क्या चंद्रगुप्त परियोजना में कथित वसूली का मामला जांच के दायरे में आती है?

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