डूबते सूर्य को अर्घ्य अर्पित कर मनाया गया छठ महापर्व, बेंदुआरा घाट पर उमड़ा श्रद्धालुओं का सैलाब…

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संवाददाता / बेंदुआरा: आस्था, अनुशासन और सामाजिक एकता का प्रतीक सूर्य उपासना का महापर्व छठ पूजा सोमवार को बड़े ही श्रद्धा और उत्साह के साथ बेंदुआरा गांव में संपन्न हुआ. गांव का हर रास्ता, हर चौपाल और घाट भक्ति के रंग में रंगा हुआ था.

ढोल-मंजीरों की गूंज, दीयों की झिलमिलाहट और व्रतियों के चेहरों पर झलकती श्रद्धा की चमक से पूरा वातावरण आस्था से ओतप्रोत दिखाई दिया. जैसे ही डूबते हुए सूर्य को अर्घ्य देने का समय आया, पूरा गाँव एक साथ घाट की ओर उमड़ पड़ा.


स्त्रियाँ सिर पर दौरा लिए खड़ी थीं, पुरुष सहयोग में आगे बढ़े, और बच्चे हाथों में दीपक व बम-पटाखे लेकर उल्लास से घाट की ओर दौड़ते दिखे।
यह दृश्य केवल पूजा का नहीं, बल्कि गाँव की सामाजिक समरसता और भाईचारे का जीवंत प्रमाण था.


डूबते सूर्य को अर्घ्य देना केवल धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि जीवन का दर्शन भी है यह सिखाता है कि हर अस्त के बाद एक नया उदय निश्चित है. जैसे सूर्य हर दिन ढलकर भी फिर से उगता है, वैसे ही हमें भी हर कठिनाई के बाद नई उम्मीद और नई रोशनी के साथ आगे बढ़ना चाहिए.


इस अवसर पर पूरा बेंदुआरा गाँव एक स्वर में एकता का संदेश दे रहा था.
हर जाति, हर वर्ग और हर परिवार बिना किसी भेदभाव, दूरी या अहंकार के साथ खड़ा था. यह वह क्षण था जब इंसानियत सबसे ऊपर थी,
जहाँ हर दिल ने कहा हम साथ हैं, हम एक हैं, और यही हमारी सबसे बड़ी ताकत है.


डूबते सूर्य की लालिमा जब बेंदुआरा के घाटों के जल में प्रतिबिंबित हुई, तो ऐसा लगा मानो हर लहर यह संदेश दे रही हो जब तक समाज एक रहेगा, तब तक उजाला कभी खत्म नहीं होगा.


सूर्य उपासना का यह महापर्व न केवल आस्था और परंपरा का प्रतीक है, बल्कि इंसानियत, समर्पण और सामाजिक एकता की सशक्त मिसाल भी है.


अपने पैतृक गाँव बेंदुआरा में डूबते सूर्य को अर्घ्य देते हुए ग्रामीणों ने संकल्प लिया कि जीवन में प्रकाश तभी रहेगा, जब समाज एक रहेगा.

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