द जन सभा | डेस्क
संवाददाता, रांची। 30 अगस्त को प्रस्तावित आदिवासी एकता महाजुटान अब विवादों में घिरता नजर आ रहा है। केंद्रीय सरना समिति, जनजाति सुरक्षा मंच समेत विभिन्न आदिवासी संगठनों ने रैली के उद्देश्य और आयोजन को लेकर सवाल उठाते हुए इसका विरोध किया है। संगठनों ने आरोप लगाया कि आदिवासी एकता के नाम पर प्रस्तावित इस महासम्मेलन के पीछे चर्च की भूमिका है और आदिवासी समाज को इसके प्रति सावधान रहने की जरूरत है। शुक्रवार को आयोजित संवाददाता सम्मेलन में केंद्रीय सरना समिति के अध्यक्ष बबलू मुंडा ने कहा कि आदिवासी एकता के नाम पर चर्च की ओर से रैली का आह्वान किया गया है। उन्होंने आदिवासी समाज के लोगों से कार्यक्रम में शामिल नहीं होने की अपील की। जनजाति सुरक्षा मंच के संदीप उरांव ने दावा किया कि आर्चबिशप हाउस की ओर से जारी पत्र में ईसाई विश्वासियों, ब्रदर और सिस्टरों से 30 अगस्त की आदिवासी एकता महाजुटान रैली में शामिल होने का आह्वान किया गया है।
संगठनों ने परिसीमन और आदिवासी राजनीतिक अधिकारों के मुद्दे पर भी सवाल उठाए। वक्ताओं का आरोप था कि इन संवेदनशील मुद्दों के नाम पर आदिवासी समाज को भ्रमित करने और राजनीतिक रूप से प्रभावित करने की कोशिश की जा रही है। संदीप उरांव ने कहा कि आदिवासी समाज को अपने राजनीतिक और संवैधानिक अधिकारों, विशेषकर पांचवीं अनुसूची वाले क्षेत्रों की सुरक्षा को लेकर सजग रहने की जरूरत है। धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान को लेकर भी वक्ताओं ने अपनी चिंता जाहिर की। जगलाल पाहन ने कहा कि सरना आदिवासी समाज और ईसाई समुदाय की धार्मिक पहचान अलग-अलग है। वहीं, मेघा उरांव ने कहा कि सरना समाज की अपनी स्वतंत्र धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान है और जल, जंगल, जमीन, धार्मिक पहचान तथा पांचवीं अनुसूची से जुड़े मुद्दों का नेतृत्व आदिवासी समाज और उसके संगठनों के हाथ में होना चाहिए।
वक्ताओं ने कहा कि आदिवासी समाज से जुड़े संवैधानिक और सामाजिक मुद्दों का इस्तेमाल किसी राजनीतिक या धार्मिक उद्देश्य के लिए नहीं होना चाहिए। संगठनों ने 30 अगस्त के प्रस्तावित कार्यक्रम को लेकर विरोध की रणनीति बनाने और आदिवासी समाज के बीच अपनी बात पहुंचाने की बात कही। इस मौके पर जगलाल पाहन, सजन मुंडा, रोहन उरांव, सन्नी टोप्पो, अशोक मुंडा, डॉ. बिरसा उरांव, सोमा उरांव, अमर मुंडा, अमित मुंडा और जगन्नाथ भगत समेत कई लोग मौजूद थे।
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