द जन सभा | डेस्क
रांची। झारखंड मुक्ति मोर्चा के महासचिव विनोद कुमार पांडेय ने भाजपा नेता एवं पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी के वित्त मंत्री को लिखे पत्र पर पलटवार करते हुए कहा कि बाबूलाल मरांडी का पत्र पढ़कर साफ लगता है कि उन्हें झारखंड के खनिज से ज्यादा चिंता खनन कंपनियों की लागत और मुनाफे की है। उन्हें तय करना चाहिए कि वे झारखंड के नेता की तरह बात कर रहे हैं या खनन कंपनियों के प्रवक्ता की तरह।
उन्होंने कहा कि कोयला और लौह-अयस्क झारखंड की खनिज संपदा है। इस पर झारखंड के उचित अधिकार और राजस्व की मांग करना कोई अपराध नहीं है। बाबूलाल जी कंपनियों की लागत और ट्रकों पर पड़ने वाले अतिरिक्त बोझ का हिसाब तो बता रहे हैं, लेकिन झारखंड की जमीन, जंगल, पानी, प्रदूषण, विस्थापन और खनन प्रभावित लोगों की कीमत का हिसाब क्यों नहीं बताते?
खनिज झारखंड का है तो उसके लाभ में झारखंड का उचित हिस्सा भी होना चाहिए।
ओडिशा का उदाहरण देने पर विनोद पांडेय ने कहा कि ओडिशा में क्या हुआ, यह अलग विषय है। ओडिशा की नीलामी का उदाहरण देकर झारखंड के अधिकार का सवाल खत्म नहीं किया जा सकता। बाबूलाल जी यह बताएं कि झारखंड के खनिज से राज्य को कितना राजस्व, स्थानीय लोगों को कितना रोजगार और खनन प्रभावित इलाकों को कितना वास्तविक लाभ मिला। बालू और पत्थर की व्यवस्था पर उन्होंने कहा कि जहां कमियां हैं, राज्य सरकार उन्हें दूर कर रही है। सरकार की प्राथमिकता पारदर्शी व्यवस्था के साथ स्थानीय लोगों और स्थानीय वाहनों को लाभ पहुंचाना है। लेकिन बाबूलाल जी यह भूल जाते हैं कि खनन व्यवस्था की समस्याएं आज पैदा नहीं हुई हैं, भाजपा सरकारों की विरासत भी इसमें शामिल रही है।
DMFT पर उन्होंने कहा कि यह राशि खनन प्रभावित क्षेत्रों और लोगों के लिए है। लेकिन बाबूलाल जी को यह भी पूछना चाहिए कि केंद्र से झारखंड के हिस्से का पैसा और अधिकार वर्षों तक क्यों रोका गया? विनोद पांडेय ने कहा कि बाबूलाल जी राज्य सरकार से सवाल जरूर पूछें, लेकिन कभी अपनी केंद्र सरकार से भी पूछें झारखंड की खनिज संपदा का उचित हिस्सा झारखंड को कब मिलेगा? खनिज अधिकारों को प्रभावित करने वाले कानूनों पर भाजपा का स्पष्ट स्टैंड क्या है? खनिज संपदा का सबसे ज्यादा लाभ झारखंड के लोगों को मिलेगा या खनन कंपनियों को? उन्होंने कहा कि बाबूलाल जी, अगर दिल्ली और खनन कंपनियों का पक्ष रखना है तो खुलकर रखिए। लेकिन उसे झारखंड के हित की राजनीति का नाम मत दीजिए। झारखंड अपने खनिज का हिसाब भी मांगेगा और अपना अधिकार भी।
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