विकास या मौत का एक्सप्रेस वे? टंडवा में हाईवा राज, कानून फाइलों में कैद !

रांची
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टंडवा: अरे यह विकास है या मौत का एक्सप्रेस वे? यह सवाल आज टंडवा का हर नागरिक पूछ रहा है। लोग पूछ रहे हैं कानून किताबों में क्यों है, सड़क पर क्यों नहीं? क्या टंडवा में कानून चलता है या फिर ट्रांसपोर्टरों का रिमोट कंट्रोल?


टंडवा की सड़कों पर हालात ऐसे हैं मानो कानून खुद सड़क पर गिरा पड़ा हो और तेज़ रफ्तार हाईवा उसके सीने पर चढ़कर दौड़ रहे हों। दिन हो या रात, हाईवा बेलगाम हैं। तेज रफ्तार, ओवरलोड, बिना कवर, बिना नंबर और सबसे खतरनाक, बिना किसी डर के।

सवाल सीधा और गंभीर है क्या टंडवा में ट्रांसपोर्टरों के लिए कोई कानून नहीं है?

स्कूल जाने वाले बच्चे, साइकिल से काम पर जाते मजदूर, सड़क किनारे खड़े बुज़ुर्ग क्या ये सब इनके लिए कीड़े-मकोड़े हैं? क्या उनकी जान की कोई कीमत नहीं?
अक्सर इस हालात को “लापरवाही” कहकर टाल दिया जाता है, लेकिन सच्चाई इससे कहीं ज़्यादा कड़वी है। यह महज़ लापरवाही नहीं, बल्कि सुनियोजित अपराध है।

नियमों की उड़ाई जा रही धज्जियां!

नियमों को जानबूझकर तोड़ा जा रहा है, आंखें बंद कर ली गई हैं और जनता को मौत के मुंह में धकेला जा रहा है। सड़कों पर राख उड़ रही है, लोग सांस नहीं ले पा रहे।

प्रशासन मूकदर्शक बना हुआ है!

सड़कें जर्जर हो चुकी हैं, लेकिन प्रशासन मूकदर्शक बना हुआ है। हादसे हो रहे हैं, लोग मर रहे हैं। कहीं बच्चों के सिर से पिता का साया उठ जा रहा है, तो कहीं मां की कोख सूनी हो रही है। सुहागन महिलाओं की मांग उजड़ रही है, घरों में मातम पसरा है और इसके बावजूद सिस्टम खामोश है।

क्या परिवहन विभाग अंधा हो चुका है? क्या पुलिस बधिर बन गई है? क्या प्रशासन को सिर्फ फाइलें दिखती हैं, लाशें नहीं? जब जनता सवाल करती है तो जवाब मिलता है “विकास हो रहा है।”


अरे साहब! अगर विकास की कीमत जान है, तो उसे विकास नहीं, विनाश कहा जाएगा। आज टंडवा में हालात इतने भयावह हैं कि लोग सड़क पर निकलने से डरते हैं। मां अपने बच्चे को बाहर भेजते वक्त कांपती है, बुज़ुर्ग शाम ढलते ही घरों में कैद हो जाते हैं। यह तस्वीर किसी युद्धग्रस्त इलाके की नहीं, बल्कि एशिया महादेश की सबसे बड़ी कोयला परियोजना के क्षेत्र की है। जो विकास का मॉडल कहलाता है।


स्थानीय लोगों का कहना है कि टंडवा के लोगों के भीतर अन्दर ही अंदर आक्रोश पनप रहा है। और अगर प्रशासन ने समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए, अगर हाईवा के आतंक पर लगाम नहीं लगी, अगर कानून सड़क पर नहीं उतरा तो जनता खुद सड़कों पर उतरेगी।

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