द जन सभा | निरंजन भारती
झारखंड में खान एवं खनिज (विकास एवं विनियमन) संशोधन अधिनियम, 2026 को लेकर झामुमो और भाजपा के बीच राजनीतिक बहस तेज हो गई है। विवाद का सबसे बड़ा सवाल यह है कि झारखंड जैसे खनिज संपदा वाले राज्यों को खनिज और खनिज-युक्त जमीन से जुड़े टैक्स और दूसरे आर्थिक अधिकार कितने मिलेंगे और इन अधिकारों पर केंद्र की भूमिका कितनी बढ़ेगी। झामुमो इसे राज्य के संवैधानिक और वित्तीय अधिकारों से जोड़कर देख रही है, जबकि केंद्र सरकार और भाजपा का कहना है कि कानून का उद्देश्य खनन क्षेत्र में स्थिरता, एकरूपता और निवेश बढ़ाना है।
सबसे पहले समझिए MMDR कानून क्या है
MMDR का पूरा नाम Mines and Minerals (Development and Regulation) है। मूल कानून 1957 में बनाया गया था। इसका मकसद देश में खदानों और खनिजों के विकास और नियमन की व्यवस्था करना है। बड़े खनिजों के मामले में केंद्र की महत्वपूर्ण भूमिका है, जबकि राज्यों की भी खनन पट्टे, स्थानीय प्रशासन और दूसरे मामलों में महत्वपूर्ण भूमिका रहती है। संविधान में खनिज विकास और खनिज अधिकारों पर केंद्र तथा राज्यों के अलग-अलग अधिकारों की व्यवस्था है।
विवाद की जड़ सुप्रीम कोर्ट के फैसले तक जाती है
इस पूरे विवाद को समझने के लिए 25 जुलाई 2024 को सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ के फैसले को समझना जरूरी है। Mineral Area Development Authority बनाम Steel Authority of India मामले में अदालत ने कहा था कि राज्यों को खनिज अधिकारों पर टैक्स लगाने की विधायी शक्ति प्राप्त है। अदालत ने यह भी माना कि खनिज-युक्त जमीन पर राज्य की भूमि कर लगाने की शक्ति का अलग संवैधानिक आधार है। सरल भाषा में समझें तो फैसला राज्यों के लिए यह महत्वपूर्ण आधार लेकर आया कि खनिज और खनिज वाली जमीन से जुड़े कुछ करों पर राज्य अपनी संवैधानिक शक्तियों का इस्तेमाल कर सकते हैं। इसके बाद खनिज संपदा वाले राज्यों के लिए इससे मिलने वाले संभावित राजस्व का सवाल और महत्वपूर्ण हो गया।
फिर आया 2026 का संशोधन विधेयक
इसके बाद केंद्र सरकार ने 10 अगस्त 2026 को लोकसभा में MMDR संशोधन विधेयक, 2026 पेश किया। लोकसभा ने इसे 12 अगस्त को और राज्यसभा ने 13 अगस्त 2026 को पारित कर दिया। इसके बाद राष्ट्रपति ने 17 अगस्त 2026 को इसे मंजूरी दी। इसके बाद केंद्र सरकार ने 22 अगस्त 2026 से इस कानून को लागू कर दिया। यानी अब यह सिर्फ संसद में चर्चा का विषय नहीं रहा, बल्कि संशोधित कानून प्रभावी हो चुका है।
असल विवाद धारा 9D को लेकर क्यों है?
संशोधित कानून में धारा 9D जोड़ी गई है। इसके तहत राज्य सरकारों द्वारा खनिज अधिकारों या खनिज-युक्त जमीन पर लगाए जाने वाले कुछ टैक्स, सेस या दूसरी लेवी पर केंद्र सरकार द्वारा तय की जाने वाली शर्तों और सीमाओं का प्रावधान किया गया है। साथ ही पुराने ऐसे बकाये, जो अभी तक वसूले नहीं गए हैं, उनके संबंध में भी विधेयक में प्रावधान किया गया है। यहीं से झामुमो का विरोध शुरू होता है। JMM का तर्क है कि अगर राज्य अपने खनिज संसाधनों से जुड़े राजस्व पर स्वतंत्र रूप से निर्णय नहीं ले पाएगा और केंद्र की तय शर्तें लागू होंगी, तो इससे राज्य की वित्तीय स्वायत्तता प्रभावित हो सकती है।
JMM को सबसे बड़ी चिंता किस बात की है?
झामुमो का कहना है कि झारखंड की अर्थव्यवस्था में खनिजों की भूमिका बहुत बड़ी है। कोयला, लौह अयस्क और दूसरे खनिज राज्य की अर्थव्यवस्था तथा औद्योगिक गतिविधियों से जुड़े हैं। इसलिए पार्टी का सवाल है कि जिस जमीन और खनिज संसाधन का बड़ा हिस्सा झारखंड में है, उससे मिलने वाले आर्थिक अधिकारों पर अंतिम नियंत्रण कितना राज्य के पास रहेगा। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने अगस्त में इस कानून का विरोध करते हुए सवाल उठाया था कि झारखंड जैसे खनिज उत्पादक राज्यों से इस तरह के बदलाव से पहले पर्याप्त परामर्श क्यों नहीं किया गया। उन्होंने कानून के खिलाफ लोकतांत्रिक, संवैधानिक और कानूनी तरीके से विरोध की बात कही थी।
1.36 लाख करोड़ रुपये का मामला क्या है?
झामुमो के विरोध में करीब 1.36 लाख करोड़ रुपये का आंकड़ा बार-बार सामने आ रहा है। पार्टी का दावा है कि सुप्रीम कोर्ट के 2024 के फैसले के बाद राज्य के खनिज अधिकारों से जुड़े पुराने आर्थिक दावों का बड़ा सवाल पैदा हुआ है। JMM का कहना है कि नए कानून के कारण ऐसे पुराने लंबित दावों पर असर पड़ सकता है। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने भी इस राशि को लेकर केंद्र से सवाल किया है कि यदि कानून के कारण राज्य को संभावित राजस्व नुकसान होता है तो उसकी भरपाई कौन करेगा। हालांकि यहां एक जरूरी बात है: 1.36 लाख करोड़ रुपये का आंकड़ा झामुमो/राज्य की ओर से रखा गया दावा है। इसे केंद्र सरकार की ओर से स्वीकार किए गए निश्चित नुकसान के आंकड़े के रूप में नहीं लिखा जाना चाहिए।
झामुमो कह रही है यह सिर्फ टैक्स का मामला नहीं
JMM इस विवाद को केवल टैक्स या पैसे का मामला नहीं मान रही है। पार्टी इसे संघीय ढांचे और राज्य के अधिकार से जोड़ रही है। उसका तर्क है कि खनिज संपदा से जुड़े फैसलों में राज्य सरकार, स्थानीय लोगों और खनन प्रभावित परिवारों की भूमिका और अधिकार सुरक्षित रहने चाहिए। झामुमो के अनुसार आदिवासी-मूलवासी समाज की जमीन, जंगल, रोजगार और पारंपरिक आजीविका भी खनन से प्रभावित होती है। इसलिए खनिज नीति बनाते समय केवल उद्योग और राजस्व नहीं, बल्कि स्थानीय समुदायों के हितों को भी देखा जाना चाहिए।
केंद्र सरकार और BJP का क्या कहना है?
यहां भाजपा और केंद्र सरकार का पक्ष भी समझना जरूरी है। केंद्र सरकार का कहना है कि संशोधन का उद्देश्य राज्यों के अधिकार छीनना नहीं, बल्कि खनन क्षेत्र में टैक्स और लेवी की व्यवस्था को स्थिर, स्पष्ट और अनुमान लगाने योग्य बनाना है। केंद्रीय खान मंत्रालय के अनुसार अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग सेस और लेवी, अचानक लगाए जाने वाले नए कर और कई तरह की लेवी से खनन की लागत बढ़ सकती है। सरकार का तर्क है कि ऐसी अनिश्चितता से निवेश प्रभावित होता है और खनिजों का उत्पादन महंगा हो सकता है।
केंद्र का दावा राज्यों के सारे अधिकार खत्म नहीं हो रहे
केंद्र सरकार ने स्पष्ट किया है कि नए कानून से राज्यों के जमीन और खनिज संबंधी सभी अधिकार खत्म नहीं होते। PIB के अनुसार, खनन क्षेत्र से जुड़े कुल टैक्स और वैधानिक भुगतानों में लगभग 90 प्रतिशत राज्यों को प्राप्त होता है और यह व्यवस्था जारी रहेगी। केंद्र ने यह भी कहा है कि राज्यों की minor minerals पर नियमन और टैक्स लगाने की शक्ति इस संशोधन से प्रभावित नहीं होगी।
यानी विवाद को आसान भाषा में ऐसे समझा जा सकता है—JMM को डर है कि केंद्र की नई शर्तें राज्य के भविष्य के राजस्व और संवैधानिक अधिकारों को सीमित कर सकती हैं, जबकि केंद्र का कहना है कि कानून का मकसद राज्यों का अधिकार खत्म करना नहीं, बल्कि खनन क्षेत्र में एक स्थिर और समान वित्तीय व्यवस्था बनाना है।
BJP का झारखंड में क्या स्टैंड है?
झारखंड भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष आदित्य साहू ने JMM और कांग्रेस के विरोध को खारिज किया है। भाजपा का कहना है कि संशोधित MMDR कानून झारखंड के हित में है और इससे अवैध खनन पर रोक लगाने में मदद मिलेगी। 1 सितंबर को साहू ने आरोप लगाया कि JMM और कांग्रेस MMDR के मुद्दे पर आंदोलन करके राज्य में चल रहे छात्र आंदोलन से लोगों का ध्यान भटकाना चाहती हैं। यह भाजपा का राजनीतिक आरोप है। इससे पहले भाजपा की ओर से यह भी कहा गया कि संशोधन से राज्यों के भूमि और खनिज अधिकार समाप्त नहीं होते। आदित्य साहू ने झारखंड सरकार पर खनिज ब्लॉकों की कम नीलामी और DMF फंड से जुड़े सवाल भी उठाए थे।
भाजपा ने सेस को लेकर भी राज्य सरकार पर सवाल उठाया
27 अगस्त को आदित्य साहू ने MMDR कानून के विरोध को लेकर कांग्रेस पर हमला करते हुए झारखंड में कोयला और लौह अयस्क पर राज्य सरकार की ओर से लगाए जाने वाले सेस का मुद्दा उठाया। उन्होंने दावा किया कि राज्य में लौह अयस्क पर 600 रुपये प्रति टन और कोयले पर 450 रुपये प्रति टन सेस लिया जा रहा है। ये आंकड़े भाजपा प्रदेश अध्यक्ष के दावे के रूप में ही देखे जाने चाहिए। भाजपा का तर्क है कि ज्यादा सेस और लेवी से उद्योग और खनन क्षेत्र की लागत बढ़ती है और इसका असर आर्थिक गतिविधियों पर पड़ सकता है।
JMM ने विरोध का फैसला कब लिया?
कानून संसद से पारित होने के बाद झामुमो ने इसे बड़ा राजनीतिक मुद्दा बनाया। 20 अगस्त को मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने झामुमो की विस्तारित केंद्रीय समिति की बैठक में पार्टी की रणनीति पर चर्चा की। इसके बाद पार्टी ने कानून के खिलाफ लोकतांत्रिक और संवैधानिक तरीके से राज्यव्यापी आंदोलन की दिशा तय की। इसके बाद झामुमो ने चरणबद्ध आंदोलन की घोषणा की। 7 सितंबर को प्रखंड मुख्यालयों पर धरना देने की योजना बनाई गई। अलग-अलग जिलों और प्रखंडों में पार्टी ने धरना-प्रदर्शन और ज्ञापन देने का कार्यक्रम शुरू किया।
अब कांके में क्या हुआ?
इसी आंदोलन के तहत कांके प्रखंड समिति ने प्रखंड कार्यालय परिसर में एकदिवसीय धरना दिया। प्रखंड अध्यक्ष नवीन तिर्की, जिला संयोजक सोनू मुंडा, डॉ. अमन तिवारी समेत पार्टी के नेता और बड़ी संख्या में कार्यकर्ता इसमें शामिल हुए।धरने में धारा 9D, राज्यों के वित्तीय अधिकार, खनिज संसाधनों पर राज्य का अधिकार, खनन प्रभावित लोगों के हित और करीब 1.36 लाख करोड़ रुपये के लंबित दावों का मुद्दा उठाया गया।
राष्ट्रपति के नाम CO और BDO को ज्ञापन
धरने के बाद झामुमो कांके प्रखंड समिति ने अंचल अधिकारी (CO) और प्रखंड विकास पदाधिकारी (BDO) के माध्यम से राष्ट्रपति के नाम ज्ञापन सौंपा। इसमें धारा 9D के प्रभाव की समीक्षा, खनिज उत्पादक राज्यों के साथ सार्थक परामर्श, राज्यों के वित्तीय अधिकारों की रक्षा और झारखंड के लंबित खनन संबंधी आर्थिक दावों के शीघ्र निपटारे की मांग की गई। ज्ञापन में आदिवासी-मूलवासी समाज, विस्थापित परिवारों और खनन प्रभावित इलाकों के अधिकारों को खनिज नीति में प्राथमिकता देने की मांग भी रखी गई।
तो आखिर झामुमो क्यों विरोध कर रही है?
पूरे विवाद को बिल्कुल आसान भाषा में समझें तो झामुमो का विरोध तीन मुख्य बातों पर है। पहला राज्य के खनिज और खनिज-युक्त जमीन से जुड़े टैक्स और राजस्व पर केंद्र की नई शर्तें। दूसरा झामुमो को आशंका है कि इससे झारखंड की वित्तीय स्वायत्तता और भविष्य के राजस्व पर असर पड़ सकता है। तीसरा—पार्टी चाहती है कि खनिज संपदा से जुड़े फैसलों में राज्य सरकार और खनन प्रभावित स्थानीय समाज की भूमिका मजबूत रहे।
दूसरी तरफ केंद्र सरकार और भाजपा का कहना है कि कानून राज्यों के सभी अधिकार नहीं छीनता। उनका तर्क है कि अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग लेवी और अनिश्चित कर व्यवस्था से खनन महंगा और निवेश के लिए कम आकर्षक होता है। इसलिए कानून का उद्देश्य खनन क्षेत्र में स्थिरता और एकरूपता लाना है। यानी असली विवाद “खनिज किसका है” से आगे बढ़कर “खनिज से मिलने वाले आर्थिक अधिकार और टैक्स पर फैसला किस सीमा तक राज्य करेगा और किस सीमा तक केंद्र शर्तें तय कर सकता है” इस सवाल पर आकर टिकता है। सुप्रीम कोर्ट के 2024 के फैसले और 2026 के नए कानून के बीच यही संवैधानिक और वित्तीय बहस इस पूरे राजनीतिक विवाद की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी है।
