द जन सभा, रांची | निरंजन भारती
नगड़ी में प्रस्तावित RIMS-2 के निर्माण को लेकर जमीन का विवाद एक बार फिर तेज होता दिख रहा है। ग्रामीणों और विभिन्न सामाजिक संगठनों ने साफ कर दिया है कि अगर किसानों की मांगों पर सरकार ने ध्यान नहीं दिया तो आंदोलन को अब नगड़ी तक सीमित नहीं रखा जाएगा। बैठक में पूरे झारखंड में आंदोलन फैलाने की रणनीति पर चर्चा हुई है। ऐसे में आने वाले दिनों में रांची पुलिस-प्रशासन के सामने कानून-व्यवस्था बनाए रखने के साथ-साथ ग्रामीणों से संवाद कायम रखने की भी बड़ी चुनौती होगी।
नगड़ी में आपात बैठक में आंदोलन तेज करने पर सहमति
गुरुवार को नगड़ी के धरना स्थल पर विभिन्न सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधियों और ग्रामीणों की आपात बैठक बुलाई गई। बैठक में नगड़ी की जमीन से जुड़े विवाद और RIMS-2 के प्रस्तावित निर्माण को लेकर आगे की रणनीति पर चर्चा हुई। ग्रामीणों और आंदोलन से जुड़े लोगों ने एकमत होकर कहा कि अगर सरकार उनकी बात नहीं सुनती है तो आंदोलन को झारखंड के दूसरे इलाकों तक ले जाया जाएगा।
ग्रामीणों का दावा-खेती की जमीन छीनने की कोशिश
नगड़ी जमीन बचाव संघर्ष समिति से जुड़े ग्रामीणों का कहना है कि जिस जमीन पर RIMS-2 का निर्माण प्रस्तावित है, वह उनके लिए सिर्फ संपत्ति नहीं है। यह जमीन खेती, रोजगार, परिवार की आजीविका और सामाजिक पहचान से जुड़ी हुई है। ग्रामीणों का आरोप है कि विकास परियोजना के नाम पर किसानों के अधिकारों की अनदेखी की जा रही है।
सरकार का पक्ष क्या है?
दूसरी ओर, सरकार की ओर से इस मामले में कहा गया है कि RIMS-2 के लिए चिन्हित जमीन सरकारी है और परियोजना का उद्देश्य राज्य में बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं का विस्तार करना है। मई 2025 में स्वास्थ्य मंत्री इरफान अंसारी ने कहा था कि परियोजना से किसी आदिवासी या किसान की निजी जमीन प्रभावित नहीं हो रही है। बाद में जिला प्रशासन की ओर से भी कहा गया कि परियोजना के लिए अधिग्रहित जमीन के मालिकों को मुआवजा दिया जा चुका है और संबंधित दस्तावेज प्रशासन के पास मौजूद हैं।
2012 से जुड़ा है नगड़ी जमीन विवाद
नगड़ी का यह विवाद नया नहीं है। इसकी जड़ें करीब 2012 के आंदोलन तक जाती हैं। उस समय इसी इलाके की जमीन पर शैक्षणिक संस्थानों के निर्माण की योजना को लेकर स्थानीय आदिवासी किसानों ने विरोध किया था। रिपोर्टों के मुताबिक उस दौर में नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी, ट्रिपल आईटी और आईआईएम जैसी परियोजनाओं को लेकर जमीन का मुद्दा सामने आया था और ग्रामीणों ने बड़े स्तर पर आंदोलन किया था।
ग्रामीणों का दावा-2012 तक कटती रही जमीन की रसीद
ग्रामीणों की ओर से लगातार यह दावा किया जाता रहा है कि वर्ष 2012 तक उनकी जमीन के नाम से राजस्व रसीद कटती रही। इसके बाद रसीद कटना बंद हो गया। इसी बिंदु को लेकर रैयत जमीन के मालिकाना हक और अधिग्रहण की प्रक्रिया पर सवाल उठाते रहे हैं। हालांकि इस पूरे दावे और जमीन की कानूनी स्थिति को लेकर सरकारी रिकॉर्ड और ग्रामीणों के दावों के बीच मतभेद बना हुआ है।
RIMS-2 के लिए जमीन का चयन बदला गया
RIMS-2 की मौजूदा जमीन को लेकर भी पहले बदलाव हुआ था। मई 2025 की रिपोर्टों के अनुसार पहले परियोजना के लिए सुकुरहुटू क्षेत्र का नाम सामने आया था, लेकिन बाद में कांके-पतरातू रोड के पास नगड़ी में करीब 207 एकड़ जमीन पर परियोजना प्रस्तावित की गई। इसी जमीन को लेकर स्थानीय ग्रामीणों ने विरोध शुरू कर दिया।
जमीन मापी के दौरान भी हुआ था विरोध
मई 2025 में नगड़ी के रैयतों ने जमीन की मापी का विरोध किया था। ग्रामीण सरना झंडे के साथ मौके पर पहुंचे थे और जमीन से जुड़े अपने अधिकारों का सवाल उठाया था। उस समय ग्रामीणों की ओर से मुआवजा और नौकरी की मांग भी सामने आई थी। प्रशासन ने रैयतों से जमीन से संबंधित दस्तावेज जमा कराने को कहा था, ताकि संबंधित रैयतों की पहचान की जा सके।
राजनीतिक स्तर पर भी बढ़ा विवाद
RIMS-2 की जमीन का मुद्दा जल्द ही राजनीतिक विवाद में बदल गया। विपक्षी नेताओं ने सरकार पर आदिवासी किसानों की जमीन लेने का आरोप लगाया और परियोजना को किसी दूसरी, गैर-कृषि या बंजर जमीन पर ले जाने की मांग की। वहीं कांग्रेस नेता बंधु तिर्की ने भी कहा था कि RIMS-2 का विरोध नहीं है, लेकिन खेती योग्य खतियानी जमीन पर निर्माण नहीं होना चाहिए।
हल जोतो, रोपा रोपो’ आंदोलन ने बढ़ाया तनाव
अगस्त 2025 में विवाद उस समय और तेज हो गया जब ग्रामीणों और आदिवासी संगठनों ने ‘हल जोतो, रोपा रोपो’ कार्यक्रम का ऐलान किया। प्रस्तावित RIMS-2 स्थल पर खेती करने और पौधे लगाने के जरिए जमीन पर अपने अधिकार का प्रदर्शन करने की रणनीति बनाई गई थी। इस कार्यक्रम को लेकर प्रशासन ने सुरक्षा बढ़ाई और इलाके में प्रतिबंधात्मक आदेश भी लागू किए थे।
पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच तनाव
24 अगस्त 2025 को प्रस्तावित स्थल पर विरोध प्रदर्शन के दौरान पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच तनाव की खबरें सामने आई थीं। कुछ रिपोर्टों में आंसू गैस के इस्तेमाल और पुलिस कार्रवाई का उल्लेख किया गया, जबकि प्रदर्शनकारियों की ओर से पुलिस पर बल प्रयोग के आरोप लगाए गए। इन आरोपों पर पुलिस का पक्ष भी खबरों में अलग-अलग तरीके से सामने आया है।
जून 2026 में शुरू हुआ RIMS-2 की बाउंड्री का काम
विवाद के बावजूद जून 2026 में RIMS-2 की प्रस्तावित जमीन पर बाउंड्री वॉल का निर्माण शुरू किया गया। निर्माण के दौरान भारी सुरक्षा व्यवस्था की गई थी। स्थानीय ग्रामीणों के एक समूह ने फिर विरोध जताया और कृषि भूमि पर निर्माण का विरोध किया। प्रशासन की ओर से कहा गया कि परियोजना के लिए अधिग्रहित जमीन के मालिकों को मुआवजा दिया जा चुका है।
जून में ग्रामीणों ने मोरहाबादी तक निकाला मार्च
RIMS-2 के विरोध में जून 2026 में नगड़ी के सैकड़ों ग्रामीणों ने मोरहाबादी मैदान तक मार्च किया था। रिपोर्टों के मुताबिक प्रदर्शनकारी करीब 20 किलोमीटर की दूरी तय कर वहां पहुंचे थे। प्रशासन ने एहतियात के तौर पर कई इलाकों में बैरिकेडिंग की थी। ग्रामीणों का कहना था कि वे अपनी जमीन पर अस्पताल निर्माण का विरोध कर रहे हैं और परियोजना के लिए दूसरी जमीन चुनी जानी चाहिए।
लोकभवन तक पहुंचा जमीन विवाद
जुलाई 2026 में भी ग्रामीणों का विरोध जारी रहा। नगड़ी के ग्रामीणों ने लोकभवन के समक्ष धरना दिया और राज्यपाल के नाम ज्ञापन सौंपकर कृषि भूमि पर RIMS-2 निर्माण का विरोध किया। ग्रामीणों ने जमीन वापस करने और परियोजना को दूसरी जमीन पर ले जाने की मांग की। उस समय भी आंदोलन को राज्यव्यापी बनाने की बात सामने आई थी।
मुआवजे को लेकर सबसे बड़ा सवाल
अब 6 सितंबर की बैठक में ग्रामीणों ने एक बार फिर सबसे बड़ा सवाल मुआवजे के रिकॉर्ड को लेकर उठाया है। उनका कहना है कि अगर किसानों ने जमीन देने की सहमति नहीं दी और मुआवजा भी नहीं लिया, तो सरकारी रिकॉर्ड में मुआवजा भुगतान कैसे दर्ज हुआ? समिति ने मांग की है कि RIMS-2 से संबंधित पुराने अधिग्रहण दस्तावेज, मुआवजा भुगतान का रिकॉर्ड और लाभुकों की सूची सार्वजनिक की जाए।
किसके नाम पर कितना मुआवजा दिया गया?’
ग्रामीणों ने सरकार से स्पष्ट जानकारी सार्वजनिक करने की मांग की है। उनका सवाल है कि किस किसान की कितनी जमीन अधिग्रहित हुई, किसके नाम पर कितना मुआवजा निर्धारित हुआ, किसे भुगतान किया गया और भुगतान किस दस्तावेज के आधार पर हुआ। समिति का कहना है कि अगर रिकॉर्ड सार्वजनिक होंगे तो विवाद की वास्तविक स्थिति सामने आ सकेगी।
आदिवासी समाज की पहचान और भविष्य का सवाल
नगड़ी जमीन बचाव संघर्ष समिति से जुड़े लोगों का कहना है कि किसानों के लिए जमीन केवल आर्थिक संपत्ति नहीं है। उनके मुताबिक यह रोजगार, आजीविका, सामाजिक पहचान और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य से जुड़ी है। इसलिए जमीन से जुड़े किसी भी फैसले में रैयतों के अधिकार और कानूनी प्रक्रिया का पूरी तरह पालन होना चाहिए।
पुलिस पर दबाव बनाने के आरोप
बैठक में कुछ ग्रामीणों ने पुलिस प्रशासन पर भी गंभीर आरोप लगाए। उनका दावा है कि किसानों के बीच भय का माहौल बनाया जा रहा है, ताकि वे जमीन के मुद्दे पर खुलकर अपनी आवाज न उठा सकें। कुछ ग्रामीणों ने पुलिसकर्मियों पर कथित अभद्र व्यवहार और जातिसूचक टिप्पणी के आरोप भी लगाए। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है और पुलिस प्रशासन का विस्तृत पक्ष सामने आना बाकी है।
आंदोलन के अगले चरण में क्या होगा?
बैठक में आंदोलन के कई संभावित कार्यक्रमों पर चर्चा हुई। इनमें पुतला दहन, मशाल जुलूस, रांची में अनिश्चितकालीन धरना और विधायकों के आवास का घेराव शामिल हैं। इसके अलावा पूरे झारखंड में आंदोलन को तेज करने की योजना पर भी चर्चा हुई। इन कार्यक्रमों की तारीख की घोषणा बाद में किए जाने की बात कही गई।
‘किसी विकास योजना के विरोधी नहीं’
ग्रामीणों ने स्पष्ट किया कि उनका कहना है कि वे विकास योजनाओं के विरोधी नहीं हैं। उनका सवाल जमीन के चयन और अधिकारों को लेकर है। उनका कहना है कि RIMS-2 जैसी बड़ी स्वास्थ्य परियोजना के लिए ऐसी जमीन चुनी जानी चाहिए, जिससे किसानों की आजीविका प्रभावित न हो।
हक की जमीन के लिए आखिरी दम तक लड़ेंगे’
बैठक में ग्रामीणों ने कहा कि वे अपनी जमीन और अधिकारों की लड़ाई लोकतांत्रिक तरीके से जारी रखेंगे। नगड़ी जमीन बचाव संघर्ष समिति ने कहा कि यदि सरकार उनकी मांगों पर बातचीत के जरिए समाधान नहीं निकालती है तो आंदोलन का दायरा बढ़ाया जाएगा।
अब सरकार के सामने दोहरी चुनौती
RIMS-2 राज्य की बड़ी स्वास्थ्य परियोजनाओं में से एक है। उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक परियोजना के लिए 207 एकड़ जमीन आवंटित की गई है और प्रस्तावित अस्पताल में बड़ी संख्या में बेड के साथ मेडिकल शिक्षा की सुविधा भी शामिल है। ऐसे में सरकार के सामने एक तरफ RIMS-2 को समय पर आगे बढ़ाने की चुनौती है, तो दूसरी तरफ नगड़ी के ग्रामीणों की जमीन और अधिकारों से जुड़े सवालों का समाधान निकालना भी जरूरी है। गुरुवार की बैठक के बाद जिस तरह आंदोलन को पूरे झारखंड तक ले जाने की बात कही गई है, उससे साफ है कि नगड़ी का जमीन विवाद आने वाले दिनों में फिर बड़ा राजनीतिक और सामाजिक मुद्दा बन सकता है।
